Wednesday, August 26, 2015

हादसा



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"निशान बेटा तुम क्या कर रहे हो ?" माँ ने अंदर के कमरे से आवाज़ लगाते हुए पूछा ।
"माँ मैं बूट पोलिश कर रहा हूँ " निशान ने अपनी मा को उत्तर देते हुए कहा।
निशान एम बी ए कर रहा था , पिता एक प्राइवेट कंपनी में जनरल मैनेजर थे, माँ स्कूल में शिक्षिका थीं व छोटी बहन बी.एस. सी. के प्रथम  वर्ष में पढ़ रही थी।
अपने मोहल्ले में खन्ना परिवार एक प्रतिष्ठित परिवार के रूप में जाना जाता था। जब भी किसी को कोई सलाह लेनी होती तो वह खन्ना साहब के पास ज़रूर आता था।
"माँ आज मेरे दोस्त का जन्मदिन है, इसलिए हम सभी दोस्त पहले तो आज मूवी देखने जायेंगे और फिर उसके बाद रात का खाना उसीके घर है। " निशान ने कमरे में आते हुए अपनी माँ से कहा।
कौनसे दोस्त का जन्मदिन है ? माँ ने पूछा  
"संदीप का " निशान ने उत्तर देते हुए कहा "माँ मैंने एक पैंट रखी है उसे ज़रा ठीक से प्रेस कर देना, मैं अपने दोस्त साहिल के घर जा रहा हूँ दोपहर को आऊंगा और फिर खाना खाके जाऊंगा। "
"ठीक है मैं मैं प्रेस कर दूंगी" माँ ने उत्तर दिया।
निशान चला गया।
आरती खन्ना अपने काम में व्यस्त हो गयी , तभी उनकी बेटी डिम्पी ने नहा कर बाथरूम से बहार आते हुए अपनी माँ से पूछा "माँ आप चाय पियोगे मैं अपने लिए बनाने लगी हूँ ?"
"हां आधा कप ले लुंगी "
"पापा कहां हैं ?" डिम्पी ने अपने गीले बालों को झटकते हुए पूछा।
"वो सब्ज़ी लेने गए हैं आते ही होंगे। "
"और भाई ?"
वो साहिल के घर गया है दोपहर को आएगा। "
डिम्पी रसोई में चाय बनाने चली गयी, आरती ने प्रेस निकाल कर गर्म करने को रख दी।
निशान की पैंट उन्होंने प्रेस करके रखी ही थी कि डिम्पी रसोई से चाय बना कर ले आई। दोनों चाय पिने बैठे ही थे कि खन्ना साहब भी सब्ज़ी लेकर आ गए।
पापा को देखते ही डिम्पी ने पूछा "पापा आप चाय लेंगे ?"
"नहीं आप लोग पियो " अपने हाथ के थैले को एक तरफ टेबल पर रखते हुए वहीँ सोफे पर बैठ गए।
कुछ देर कमरे में सिर्फ चाय की चुस्कियों की ही आवाज़ आती रही।
"डिम्पी ज़रा टीवी चालू कर के न्यूज़ तो लगा दे। " खन्ना साहब ने कहा।
डिम्पी ने टीवी तो चालू किया मगर न्यूज़ की जगह मूवी लगा दी।
खन्ना साहब ने हलके से गुस्से वाले तेवर बनाते हुए अपनी बेटी की तरफ देखा , डिम्पी ने भी उस गुस्से को महसूस किया मगर वह इसी तरह चैनल को पलटती रही।
कुछ देर तो खन्ना साहब बर्दाश्त करते रहे मगर फिर वह उठ कर जाने लगे तो डिम्पी ने कहा "पापा.. बैठो मैं तो मज़ाक कर रही थी" कहती हुई मुस्करा कर न्यूज़ लगादी।
खन्ना साहब फिर सोफे पर धप्प से बैठ गए।
"अभी अभी खबर मिली है कि शहर के कई इलाकों में एक के बाद एक थोड़े थोड़े अंतराल पर बम धमाके हुए हैं , इन धमाकों में कई लोगों की जान जाने का अंदेशा जताया जा रहा है। हम आपको पूरी खबर विस्तार से कुछ ही पलों में दिखाएंगे। "
अचानक टीवी पर आई इस 'ब्रेकिंग न्यूज़' से आरती खन्ना के चेहरे पर चिंता की लकीरें खिंच गईं।
"सुनो निशान भी बाहर गया हुआ है, आप ज़रा निशान को फ़ोन तो लगाओ।" आरती ने अपने पति की तरफ देखते हुए कहा।
"अरे तुमतो ऐसे ही चिंता करती रहती हो , हमारे निशान को क्या होगा ?"
"आप फोन तो लगाओ " आरती ने फिर कहा।
अपना सर झटकते हुए खन्ना साहब ने निशान को फोन लगाया, कुछ देर रिंग बजती रही मगर फिर बंद हो गई।
"अभी फोन उठा नहीं रहा है, मस्त होगा अपने दोस्तों में। " खन्ना साहब ने कहा।
मगर आरती के चेहरे पर चिंता के भाव साफ़ देखे जा सकते थे। डिम्पी ने अपनी माँ की तरफ देखा और उसका हाथ अपने हाथ में लेकर हलके से दबाते हुए कहा "माँ चिंता मत करो भाई अभी आ जायेगा। "
तीनों की नज़रें टीवी पर टिकी हुईं थीं। अब सभी न्यूज़ चैनल पर यही खबर दिखाई जा रही थी। टीवी पर जिस तरह की तस्वीरें दिखाई जा रहीं थीं उन्हें देख कर तो किसी का भी दिल दहल जाये।
"आप साहिल को फोन लगाओ उसी के घर तो गया था निशान " आरती ने फिर अपने पति से कहा।
खन्ना साहब ने साहिल को फोन लगाया, उसके फोन की रिंग भी बज कर बंद हो गई।
"वो भी फोन नहीं उठा रहा, दोनों घूम रहे होंगे कहीं, एक बार दोस्तों के साथ घूमने  निकले तो फिर घर की चिंता किसे रहती है ? " खन्ना साहब ने थोड़ा झुंझलाते हुए कहा।
"आप खुद जाइये ना साहिल के घर पता लगाने। " आरती ने कहा।
"अरे पागल हो गई हो ? अभी आ जायेगा निशान। "
न्यूज़ चल रही थी व उस पर धमाकों से हुए नुक्सान के चित्र दिखाए जा रहे थे, मगर मरने वालों के बारे में कोई भी पुख्ता समाचार किसी न्यूज़ चैनल ने नहीं दिया था।  पुलिस ने पूरे एरिया को कॉर्डन कर रखा था।  चारों तरफ भाग दौड़ मची हुई थी।
करीब एक घंटा बीत गया था मगर न तो निशान से और ना ही साहिल से कोई बात हो पा  रही थी।
"डिम्पी रोटी तो बना भूख लग रही है " खन्ना साहब ने अपनी बेटी की तरफ देखते हुए कहा।
"अरे आप एक बार फिरसे फोन तो लगाओ " आरती ने कहा तो खन्ना साहब ने फिर से फोन लगाया मगर फिर रिंग बज कर बंद हो गई।
"बड़ा ही लापरवाह लड़का है। बस दोस्तों के साथ हो तो घर की सुध ही नहीं रहती। " झल्लाते हुए खन्ना साहब ने कहा।
डिम्पी खाना बनाने लग गई।
"मम्मी भाई की रोटी भी बना कर रख दूँ ?" रसोई में ही से डिम्पी ने पूछा।
"हाँ बनादे कह कर तो गया था खाना घर पर ही आकर खायेगा। "
खन्ना साहब के आगे टेबल पर डिम्पी ने खाना ला कर रख दिया।
अभी उन्होंने पहला निवाला तोडा ही था कि फोन की घंटी बजी।
"लो तुम्हारे बेटे का ही फोन होगा। " खन्ना साहब ने बिना फोन की तरफ देखे ही कहा।
सुनते ही आरती भाग कर अपने पति के पास आते हुए बोली "पूछो कहाँ है , जल्दी से घर आने को कहो। "
खन्ना साहब ने हाथ का इशारा कर के सब्र रखने को कहा और खुद फोन कान से लगाते  हुए बोले "अरे निशान बेटा कहाँ हो तुम ? तुम्हे पता तो है शहर में कितने बम धमाके हुए हैं, तुम्हारी माँ कितनी चिंता कर रही है ?" एक ही सांस में बोल गए खन्ना साहब।
"क्या ये फोन आपके बेटे का है ?" सामने से आवाज़ आई।
"हाँ मगर... आप.... कौन ?" रुक रुक कर घबराई सी आवाज़ में उन्होंने पूछा।
"ये फोन यहाँ कार के नीचे पड़ा था मैंने इसकी रिंग की आवाज़ सुन कर इसे उठाया और आपको फोन किया। " सामने से आवाज़ आई "मैं यहाँ बम धमाके वाली जगह से इंस्पेक्टर पाटिल बोल रहा हूँ , मैं आपसे रिक्वेस्ट करता हूँ कि आप जल्दी ही यहाँ पहुंचे, यहाँ बम धमाकों में मारे गए लोगों की लाशें पड़ी हुईं हैं , मैं ये नहीं कहता कि आपका बेटा भी....... मगर फिर भी आप एक बार यहाँ आ कर देख लेंगे तो तस्सल्ली हो जाएगी।"

खन्ना साहब के हाथ कांपने लगे, साँसे फूल गई, आँखे फटी की फटी रह गई, फोन हाथ में से सरक कर नीचे गिर गया।
"अरे क्या हुआ ? आप कुछ बोल क्यों नहीं रहे ?" आरती ने चिल्लाते हुए पूछा।
खन्ना साहब कुछ बोल नहीं पाये सिर्फ उनके होंट फड़फड़ा कर रह गए।
"अरे मैं पूछती हूँ किसका फोन था ? कुछ बोलते क्यों नहीं ?" आरती ने अपने पति को झंझोड़ते हुए कहा।
"पुलिस इंस्पेक्टर का फोन था, उन्होंने बुलाया है। " अपनी लडखडाती आवाज़ में खन्ना साहब ने कहा।
"क्या " आरती के भी हाथ पाँव फूल गए, वो वहीँ पर धप्प से बैठ गई।
खन्ना साहब जिस पोजीशन में बैठे थे वैसे ही उठते हुए कांपते हाथों से अपनी पत्नी के कंधे का सहारा लेकर खड़े होते हुए बोले "कुछ नहीं हुआ है.... कुछ नहीं होगा, हमारे बेटे को कुछ नहीं हो सकता, तुम चिंता मत करो मैं अभी अपने बेटे को लेकर आता हूँ..... चिंता मत करो तुम..... अभी आता हूँ मैं। " खन्ना साहब की आवाज़ कांप रही थी, दिल ज़ोरों से धड़क रहा था।
"नहीं मैं भी चलूंगी आपके साथ। "
"हाँ हाँ चलो। "
दोनों ही दरवाज़े की तरफ भागे। डिम्पी भी बड़ी चिंतित सी दिख रही थी व उसने रोटी बनानी भी बंद करदी थी। वह मन ही मन अपने भाई के लिए प्रार्थना कर रही थी।
घटना स्थल पर पहुँच कर उन्होंने देखा हालात काफी ख़राब थे आदमी, औरतों और बच्चों की लाशें पड़ी हुईं थीं। पुलिस ने पूरे एरिया को अपने कब्ज़े में कर लिया था व वह अपनी कार्रवाही कर रहे थे। 
भागे भागे खन्ना साहब इंस्पेक्टर पाटिल के पास गए। इंस्पेक्टर पाटिल  ने उन्हें देखा और उन्हें थोड़ी दुरी पर लेजाते हुए कहा "हमें यहां ये मोबाइल मिला, आप हिम्मत रख कर बड़े ही ध्यान से देखिये। "
खन्ना साहब व उनकी पत्नी बड़े ही मज़बूत मन से एक एक बॉडी को बड़े ही ध्यान से देख रहे थे। उन्होंने कभी सोचा न था कि उनको अपने बेटे को इस तरह से ढूंढना पड़ेगा। 
"ये रहा हमारा निशान " एक बॉडी को देखते ही आरती ज़ोर से चीखी। 
उसकी चीख सुनकर खन्ना साहब ज़ोर से चिल्लाये "पागल मत बनो, ध्यान से देखो"   
मगर उन्हें सच का सामना तो करना ही था। कुछ देर की छान  बिन के बाद ये पता चल गया कि वह निशान ही था। 
खन्ना साहब व उनकी पत्नी का मानो  पूरा खून किसीने निचोड़ लिया हो, दोनों ही दहाड़ें मार मार कर रो रहे थे। 
बड़ी मुश्किल से अपने आप को सँभालते हुए खन्ना साहब ने इंस्पेक्टर पाटिल से कहा "मैं हमेशा यही समझता रहा कि हादसे तो  सिर्फ दूसरों के साथ ही होते हैं, मैं यह भूल गया कि हादसे तो किसी के भी साथ हो सकते हैं। "
पोस्टमार्टम के बाद उन्हें बॉडी दे दी गई। 
खन्ना साहब इस हादसे में अपना सब कुछ गवां चुके थे। 

वह तो सिर्फ यही कहते रहे "यह बम चलाने वाले दूसरों के ही बच्चों को क्यों मारते हैं, क्यों वह एक बम अपनी बीवी और बच्चों पर नहीं फेंकते हैं, तभी उन्हें अपनों को खोने के दर्द का एहसास होगा और फिर शायद वह कभी भी किन्ही निर्दोष लोगों को इस तरह नहीं मारेंगे " 

Romy Kapoor




  

Wednesday, May 27, 2015

सुकून







रात के अँधेरे को चीरती ऑटो रिक्शा खाली सड़क पर सरपट भागी चली जा रही थी। इतनी हवा के बावजूद भी ड्राइवर के माथे पर पसीने की बूंदे साफ़ चमक रहीं थीं, चेहरे पर हवाइयां उड़ रहीं थीं। वह जल्द से जल्द अपने घर पहुँच जाना चाहता था, इसीलिए अपने ऑटो रिक्शा को वह पूरी स्पीड में भगाए जा रहा था।  उसके दिल की धड़कने तेज़ चल रहीं थीं और दिल में एक डर भी था कि कहीं कोई पुलिस वाला किसी वजह से रोक ना ले  .गनीमत रही कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।
अपने मोहल्ले में पहुँच कर उसने माथे पर आईं पसिमे की बूंदों को पोंछकर  अपनी ऑटोरिक्क्षा को अपने घर की तरफ मोड़ा ही था कि सामने से आते हुए उसके एक मित्र ने हाथ दे कर रोकते हुए पूछा "अरे करन क्या बात है आज जल्दी आ गया ? ठीक तो है ना ? "
"हाँ बस थोड़ा ठीक नहीं लग रहा था तो वापस आ गया। " करन ने उत्तर दिया।
"यार कोई काम पड़े तो मुझे फ़ोन कर के बुला लेना। "
"हाँ हाँ ज़रूर , चल यार कल मिलते हैं। " कहते हुए उसने अपनी ऑटो रिक्शा आगे बढ़ा दी।

घर पहुँच कर उसने ऑटो रिक्शा को साइड में लगाया और अपनी पीछे वाली सीट की आड़ में रखे बैग को निकाला  फिर अपने आस पास नज़रें घुमायीं और आश्वस्त होने के बाद बैग लेकर जल्दी से अपनी खोली में दाखिल हो गया।
"अरे क्या बात है आप आज इतनी जल्दी वापस आ गए ?" करन को  देखते ही उसकी पत्नी ने बड़े ही आश्चर्य से पूछा। और ये बैग किसका है ? क्या है इसमें ?"
"अरे थोड़ा धीरे बोल कोई सुन लेगा !" अपनी पत्नी के मुँह पर हाथ रखते हुए करन ने कहा "यहाँ मेरे पास बैठ और बड़े ध्यान से सुन" अपनी आवाज़ को और धीमी करते हुए करन ने कहा और आगे बोला "इस बैग में 50 लाख रुपये हैं। " करन ने इधर उधर देखते हुए अपनी बात पूरी की।
"पचास लाख ?" करन की पत्नी राधा के तो जैसे होश ही उड़ गए, आँखे फटी की फटी रह गईं। वह चिल्ला पड़ी।
"ऐ तू मरवाएगी कह रहा हूँ धीरे बोल, चिल्ला मत, पर तू सुनती ही नहीं है।"
"मगर इतना पैसा आप लाये कहाँ  से ? किसी के यहाँ चोरी...........।" घबराई सी राधा ने पूछा।
"नहीं  नहीं। " अपनी पत्नी को बीच में ही टोकते  हुए उसने कहा
" एक पैसेंजर बैठा था मेरी अॉटो रिक्शा में उतरते समय वह जल्दी में सिर्फ अपने हाथ वाला बैग लेकर उतर गया और ऑटो रिक्शा में रखा बैग उठाना ही भूल गया शायद बहुत घबराया हुआ था। पहले तो मैंने भी ध्यान नहीं दिया, मगर ऑटो चलते हुए मेरी नज़र जब मिरर में से पीछे गयी तो मैंने देखा कि पीछे एक बैग पड़ा था।  मैंने अँधेरे में एक कोने में ऑटो को रोका और बैग को खोल कर देखा तो मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं, उसमे हज़ार हज़ार की गड्डियां थीं।  मैंने तुरंत उन गड्डियों को गिना तो पाया कि वह पूरे पचास लाख रुपये थे।"
करन कुछ देर तक सांस लेने के लिए रुका और फिर आगे बोलना शुरू किया "इतने रुपये देख कर मैं पूरा का पूरा पसीने से भीग गया , पहले तो सोचा कि जाकर उसे यह रुपये लौटा दूँ मगर फिर अगले ही पल मुझे तुम्हारा और बच्चों का ख्याल आया, सोचा कि आखिर कब तक युही ऑटो रिक्शा चला कर इस तरह की ज़िन्दगी गुजारेंगे। " करन चुप हो गया .
मगर यह पाप है , मैं तो कहती हूँ की आप उसका रूपया लौटा आओ, इसी में भलाई है।" उसकी पत्नी राधा ने कहा
"पागलो वाली बातें मत कर, हम यह रुपया लेकर कहीं दुसरे शहर में चले जायेंगे और अपनी नयी ज़िन्दगी शुरू करेंगे, बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाएंगे।  मैं यह पैसे लौटाने नहीं जाऊंगा, और तू भी अपनी ज़बान बंद रखना , किसी से कुछ कहना नहीं , हम जल्दी ही यह शहर छोड़ देंगे।" करन की आवाज़ में थोड़ा गुस्सा था।

दोनों में इस बात पर काफी देर तक बहस बाज़ी होती रही। राधा करन पर  ज़ोर डालती रही पैसे लौटा आने को मगर कारन टस से मास नहीं हुआ।  आखिर दोनों चुप हो गए।
करन ने नोटों वाला बैग हाथों में दबाया और लेट गया।
लेट तो राधा भी गयी थी मगर उसके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ़ झलक रहीं थीं।
इतने पैसे पा कर बेचैन तो करन  भी था, इतने नोट एक साथ उसने अपनी ज़िंदगी में पहली बार ही देखे थे। नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी, तरह तरह के सपने देख रहा था। कभी अपने आप को कार में बैठा देख रहा था, तो कभी खुद को अपनी पत्नी और बच्चों के साथ किसी हिल स्टेशन पर, वह अपने आप को सूट बूट में किसी बिज़नेसमैन के रूप में भी देख रहा था।

करवटें बदलते रहे करन और राधा, दोनों ही, मगर दोनों ही को नींद न आने के कारन अलग अलग थे। करन जब भी करवट बदलता तो नोटों से भरा बैग घुमा कर अपनी तरफ कर लेता और ज़ोर से कस कर पकड़ लेता।
सुबह उठे तो दोनों ही के बीच में एक तनाव सा था। राधा करन से बात भी नहीं कर रही थी।

नहाधो कर  राधा ने चाय बनाकर रात की पड़ी बासी रोटी अपने बच्चों  को और करन को नाश्ते में दी। नाश्ता कर के करन नोटों के बैग के पास बैठा था कि राधा ने पूछा "आज ना जाओगे काम पर ?"
"नहीं इत्ता पैसा घर में पड़ा है, तू अकेली तो संभाल भी न पायेगी , और अब मुझे ऑटोरिक्शा चलाने की क्या ज़रुरत है ? करन ने उत्तर दिया
"मैं तो अब भी कहती हूँ ये पैसा वापस लौटा आओ। " राधा बोली
"देख मैंने तुझे पहले भी कहा था पागल मत बन , पचास लाख बहुत होता है ज़िन्दगी सवंर जाती है " करन बोला। 
"या बिगड़ जाती है। " राधा ने कहा
"क्या मतलब ?" चौंकते हुए करन ने पूछा।
"जिनके रुपये खोये हैं उनकी क्या हालत हो रही होगी ? पता नहीं वो रूपये वह किस काम के लिए ले जा रहे थे ! क्या उनकी ज़िन्दगी के बारे में सोचा ?
करन निरुत्तर सा राधा को देखता रहा। कुछ देर रुक कर फिर बोला "तू कुछ भी बोल मैं ये रुपये लौटाने वाला नहीं। "
राधा चुप हो गयी।
दिन यूंही बीत गया। करन घर से बहार नहीं निकला राधा और करन में भी कोई खास बात नहि हुइ।
करन नोटों के भरे बैग को अपने से अलग नहीं होने देता था। इसी वजह से वह न तो रात को ठीक से सो पाता था और नाही दिन में। वह अब काफी थका थका सा लग रहा था कई दिनों से उसने ऑटो भी नहीं चलाया था , करन न तो बहार निकलता था नहीं काम पर जाता था। एक दो बार तो उसका मित्र भी उससे मिलने आया मगर उसे भी उसने बाहर से ही टरका दिया था। राधा परेशान थी, वह ना तो करन से ठीक तरह से बात करती थी नाही उसके पास ज़्यादा बैठती थी। जब कभी भी अगर थोड़ी बहुत बात करती भी थी तो सिर्फ अपने पति को समझाने के लिए। करन ने एक दो बार उसे यह शहर छोड़ कर दुसरे शहर में जाके बसने को भी कहा मगर राधा बात को सुनी अनसुनी  कर टाल देती। शायद इसी उम्मीद में कि करन को अपनी गलती का एहसास हो जाए और वह इन पैसों को लौटा दे।

सुबह का समय था।  करन युही बैठा हुआ था अध खुली अध बंद आँखों में। बिना नींद के उसकी आँखे सूजी सूजी सी लग रहीं थीं। उसके मन में तरह तरह के विचार आ रहे थे। वह सोच रहा था कहीं उसने ये पैसे ना लौटा कर कोई गलती तो नहीं की ? इतने सारे पैसों से वह करेगा क्या ? क्या उसकी पत्नी उसे सही सलाह दे रही थी ? जब   से पैसे आये हैं तभी से उसका सुख और चैन गायब हो गया है। क्या इस तरह के डर के साये में वह कभी भी चैन से रह पायेगा ? कभी इतने पैसों के साथ पुलिस ने पकड़ लिया तो ?  उसके बच्चों की और उसकी पत्नी की ज़िन्दगी बर्बाद हो जाएगी।

इसी उधेड़ बुन में वह काफी देर तक बैठा सोचता रहा। कभी एक ख्याल आता तो कभी दूसरा। काफी देरतक वह इन पैसों के फायदे और नुकसान के बारे में सोचता रहा। वह उस परिवार के बारे में भी सोच रहा था जिनके पैसे खोये थे। क्या बीत रही होगी उनपर ? कहीं उन्होंने पैसे खोने की फरियाद पुलिस में तो नहीं कर दी।
इसी तरह वह घंटो सोचता रहा और फिर आखिर में वह एक निर्णय पर पहुंचा।  उसने अपनी पत्नी की तरफ देखा फिर अपने बच्चों की तरफ, मासूमों को तो पता ही नहीं था कि हो क्या रहा है ? उसने फिर अपनी पत्नी की तरफ देखा और बोला "राधा यहाँ आओ मेरे पास बैठो मैं तुमसे ज़रूरी बात करना चाहता हूँ। " राधा जब करन के पास आकर बैठी तो उसका हाथ अपने हाथ में लेकर धीरे से बोला 
" तुम जीत गई राधा " राधा ने चौंक कर अपने पति की तरफ देखा और बोली "क्या मतलब ?"
"राधा मैंने फैसला किया है कि मैं अभी जाकर यह पैसे लौटा आऊंगा। "
"सच ?" राधा के चेहरे पर ख़ुशी की लहर दौड़ गयी।
"हाँ राधा , मैं अभी यह पैसे लौटाने जा रहा हूँ और तुम चल रही हो मेरे साथ  " राधा का हाथ अपने हाथों से  दबाते हुए बोला और तपाक से खड़ा हो गया।

उसने नोटों का भरा बैग उठाया और अपनी ऑटो के पीछे रखा, राधा को पीछे बैठाया और चल दिया वही जहा उस रात उस पैसेंजर को उसने उतारा था। राधा बहुत खुश थी।

वह एक कोठी थी , गेट पर पहुँच कर उसने ऑटो रोका , उतरकर गेट खोला व ऑटो को लेकर सीधा अंदर पोर्च में जाकर ऑटो को खड़ा कर दिया।

मुख्य द्वार पर दस्तक दी कुछ ही पलों में वह दरवाज़ा खुला और वही आदमी करन के सामने खड़ा था जो उस रात बैग भूल गया था। उसने एक नज़र करन की तरफ डाली तो एक नज़र उसकी पत्नी पर और फिर उस ऑटो को देखने लगा।
"कहिये कौन हैं आप ?" उसकी आवाज़ में एक उत्सुकता भी थी।
"साब मैं वही हूँ जिसके ऑटो में आप पैसों से भरा बैग भूल गए थे। " करन बोला।
"क्या ? कहाँ हैं वह रुपये ? "
करन ऑटो की तरफ गया और बैग उस व्यक्ति के हाथ में थमाता हुआ बोला "साब ये रहे आपके रपये, आप चेक कर लीजिये "

उस व्यकि ने तुरंत ही बैग खोला और उसमे रखे नोटों पर अपनी नज़र दौड़ाते हुए करन की तरफ देख कर बोला "तुम्हारा लाख लाख शुक्रिया, तुम्हे नहीं मालूम, ये रुपये मेरे लिए कितने ज़रूरी थे ? तुमने ये लौटा कर मुझ पर बहुत बड़ा एहसान किया है, तुम मांगो मैं तुम्हे उतना इनाम दूंगा। "
"नहीं साब मुझे कुछ नहीं चाहिए, जबसे ये पैसे मेरे घर आये तबसे मेरा सुख चैन गायब हो गया , मेरी पत्नी मुझसे दूर हो गई मैं अपने परिवार और मित्रों से दूर हो गया।  एक बोझ जो मेरे सीने पर था वह उतर गया है ,मैं अपने आप को हल्का महसूस कर रहा हूँ। "

करन बिना कोई बात सुने अपनी पत्नी का हाथ थामे अपनी ऑटो की तरफ बढ़ गया राधा को पीछे बिठा कर ऑटो स्टार्ट कर के चल दिया। 

ऑटो सड़क पर सरपट दौड़ा जा रहा था और करन मन ही मन मुस्कुराता हुआ सोच रहा था "सचमुच कितना सुकून होता है सच्चाई में। "

ROMY KAPOOR 

Sunday, April 5, 2015

जय मातादी !


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आकाश उदास सा अपनी बालकनी में बैठा हुआ था, हाथों में किताब थी, उसी के पन्ने  पलट रहा था, पढ़ने का भी जी नहीं कर रहा था तो किताब को अपनी टांगो पर रख कर टाँगे पसार कर बैठते हुए आँखे मूँद लीं। उसे पता ही नहीं चला कब उसकी आँख लग गई , उसकी नींद तो तब खुली जब किसीने उसे झकझोर के उठाने की कोशिश की।
"कौन......? कौन है ? अचानक नींद में से जाग कर अपनी पलकें झपकते हुए उसने इधर उधर देखते हुए पूछा।
"मैं हूँ , देखो " एक स्त्री की आवाज़ ने उसे चौंका दिया।
आकाश पूरी तरह से जाग चुका था और अपने सामने किसी अनजान स्त्री को खड़ा  देख कर चौंक गया।

वह स्त्री बहुत ही सुन्दर दिख रही थी, लम्बे लम्बे बाल, कानों में कुण्डल, माथे पर लाल बिंदी व हलकी गुलाबी रंग की साड़ी पहन रखी थी।  उसके चेहरे पर अजीब सा तेज था व बड़ी बड़ी आँखे उस चेहरे को और भी सुन्दर बना रहीं थीं।

"तुम.....?  तुम कौन हो और अंदर कैसे आईं ? आकाश झट से उठ कर मुख्य दरवाज़े की तरफ भागा, उसने दरवाज़े की कुण्डियां चेक कीं, सही से लगी हुईं थीं। वह फिर हड़बड़ा कर भागता हुआ अपनी बालकनी में आया, उसने देखा वह स्त्री मंद मंद मुस्कुरा रही थी।
"दरवाज़ा तो अंदर से बंद है फिर तुम अंदर कैसे आई ? कौन हो तुम ?" आकाश बौखलाया हुआ था।
"अरे मुझे नहीं पहचाना ?" उस स्त्री ने मुस्कुराते हुए पूछा  .
"नहीं, मैंने तो तुम्हे पहले कभी भी नहीं देखा ! कौन हो तुम ?" आकाश की हालत एकदम खस्ता थी।
"मैं... वैष्णवी" उस स्त्री ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया।
"वैष्णवी ? कौन वैष्णवी ?" आकाश काफी घबराया हुआ था।
"अरे , वैष्णवी , जिसकी तुम पूजा करते हो और हर रविवार मेरे मंदिर में माथा टेकने आते हो, वही "
"माँ वैष्णो देवी ?" आकाश ने फटी आँखों से पूछा।
"हां वही" मुस्कुराते हुए उस स्त्री ने उत्तर दिया।
"तुम मज़ाक मत करो" आकाश ने अपना सर झटकते हुए कहा "ये भगवान और देवियाँ फिल्मों और टीवी सीरियलों में ही इस तरह से सामने प्रकट होते हैं, सच में तो किसे भगवान और देवियाँ दिखाई देतीं हैं ?" आकाश ने कहा।
"तुम मेरा विश्वास क्यों नहीं कर रहे हो ?'
"अरे कैसे करू विश्वास ? ऐसा भी कभी होता है ? तुम तो मुझे यह बताओ कि तुम कौन हो और मेरे घर में कैसे घुसी ? वार्ना मैं अभी पुलिस को बुलाता हूँ " आकाश अब काफी परेशान दिखाई दे रहा था।
"अरे तुम मेरी पूजा रोज़ करते हो और आज जब मैं तुम्हारे सामने खड़ी हूँ तो तुम मुझे पहचानने से भी इंकार कर रहे हो ?"
"हाँ तो कैसे विश्वास करूँ ? क्या आज के ज़माने में भी कभी देवी देवता इस तरह से किसी के घर में प्रगट होते हैं क्या ?"
"तुम मनुष्य भी बड़े ही अजीब होते हो, दुःख के समय चिल्ला चिल्ला कर कहते हो कि "हे माँ हे भगवन तुम कहाँ हो ? तुम क्यों नहीं आते सामने, और अब जब मैं तुम्हारे सामने खड़ी हूँ, तुम पहचानने से ही इंकार कर रहे हो " उस स्त्री ने कहा।
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"ठीक है बुलाओ। "



आकाश समझ गया कि यह स्त्री ऐसे नहीं जायेगी , उसने तुरंत पुलिस को फ़ोन किया, करीब आधे घंटे बाद पुलिस आ गई। आकाश के घर पुलिस को आई देख कर अड़ोस पड़ोस के लोग भी उसके घर में इकट्ठा हो गए।

"बताइये क्या बात है ?" इंस्पेक्टर आकाश से मुखातिब होते हुआ बोला।
"सर, यह औरत पता नहीं कहाँ से मेरे घर में घुस आई है और पूछने पर कहती है कि मैं माता वैष्णो देवी हूँ। " आकाश ने उस औरत की तरफ इशारा करते हुए कहा
आकाश की बात सुनते ही पहले तो इंस्पेक्टर ने आकाश को सर से पांव तक बड़ी ही अजीब नज़रों से देखा फिर चारों तरफ नज़रें घूमा कर देखते हुए पूछा "कहाँ है वह औरत ?"
"इंस्पेक्टर साहब यह सामने तो खड़ी है !" आकश ने फिर उस ओर इशारा करते हुए कहा।
"अरे आकाश भाई कहाँ है कोई औरत ? कौनसी औरत के बारे में बात कर रहे हो ?" आकाश के पड़ोसी ओमप्रकाश ने पूछा।
"यह सामने खड़ी औरत आप लोगों को दिखाई नहीं दे रही है क्या ?" आकाश झल्ला कर बोला, उसने देखा वह औरत अब भी मंद मंद मुस्कुरा रही थी।
"आकाश तुम आराम से बैठो, पानी पियो, क्या हो गया है तुम्हें ? ओमप्रकाश ने आकाश को खिंच कर कुर्सी पर बैठाया, किसीने लाकर पानी दिया, सभी आपस में फुस फुसा रहे थे और आकाश को देख कर मुस्कुरा रहे थे , मगर आकाश बार बार उधर इशारा कर के अपनी बात दोहराता रहा, लेकिन सभी उसे पागल समझ रहे थे, पुलिस इंस्पेक्टर ने भी उसे इस तरह से उनका समय बर्बाद करने के लिए झिड़का व वार्निंग देकर चला गया। अड़ोस पड़ोस के लोग भी मुस्कुराते हुए आकाश की बातें करते हुए चले गए।

किसी ने कहा "बेचारे की बीवी यहाँ नहीं है इसलिए पगला गया है" तो किसी ने कहा अकेले बैठे बैठे दिमाग सतक गया लगता है" सभी अपने अपने तरीके से व्यंग कस्ते रहे व आकाश की तरफ देखते व हस देते। 


"तुम सच बताओ तुम कोई छलावा हो, कौन हो तुम ?" आकाश को लगा वह वाकई में पागल हो जायेगा।

"ठीक है ऐसे तो तुम मानोगे नहीं ये लो "
Image result for free images of mata vaishnodeviता रहा उसके सामने शेर खड़ा था और वह स्त्री उसके ऊपर बैठी आकाश की आँखे फटी की फटी रह गईं, वह बस साँसे रोके देखथी।






"माँ तुम मेरे घर में !" आकाश हाथ जोड़ कर नत मस्तक हो गया।
"हाँ मैं हर उस घर में हूँ जो सच्चे दिल से मुझे याद करता है, मैं हर उस इन्सान के पास हूँ जो तकलीफ में और मुसीबत में है। " माँ ने कहा
"मगर माँ तकलीफ और मुसीबत भी तो आप ही देते हो।" आकाश उसी तरह हाथ जोड़े खड़ा था।
"ये उसके पिछले जन्मों के कर्मों का फल है जो उसे भुगतना पड़ता है।" 
"तो क्या इस जनम के कर्मों का फल अगले जनम में भुगतना पड़ेगा ?"
"कुछ ऋण ऐसे होते हैं जो  मनुष्य को इसी जनम में अदा करने  पड़ते हैं जबकि कुछ ऋण ऐसे भी होते है जो उसे अगले जनम में चुकाने पड़ते हैं। लेकिन यह तो तय है कि हर इंसान को अपने कर्मों का फल तो भुगतना ही पड़ता ही  है । "
"जब सभी यह जानते हैं तो लोग छल कपट और पाप क्यों करते हैं ?" आकाश ने फिर पूछा।
"यही तो नियति है " माँ ने कहा।
"माँ मैं आज धन्य हो गया, आप मेरे घर पधारे हैं, मुझे क्षमा करना मैंने आप को क्या कुछ नहीं कहा , यहाँ तक कि पुलिस तक को बुला लिया !" आकाश क्षमा वाली मुद्रा में बैठा था फिर कुछ देर रुका और बोला "माँ आइये ना अंदर बैठ कर बातें करते हैं" आकाश वैष्णो देवी माता को अंदर ले गया।
"माँ मेरी समझ में नहीं आ रहा कि मैं आपकी सेवा कैसे करूं ? आप बड़ी दूर से आईं हैं पानी तो पियेंगी ना ?"
"हाँ ले आओ "
आकाश कांच के गिलास में पानी ले आया, गिलास उनके हाथ में थमाते  हुए  बोला "माँ आप कहां रहती हैं ?
"मैं आकाश में रहती हूँ " मुस्कुराते हुए आकाश की तरफ देखा और बोलीं "ज़रूरत सिर्फ सच्चे दिल से अपने दिल में झाँकने की है, तुम काफ़ी दिनों से बड़े उदास थे और बार बार मुझे याद कर रहे थे, इसीलिए मुझे आना पड़ा" माँ ने कहा .
"माँ आपका लाख लाख धन्यवाद " आकाश नतमस्तक हो गया, फिर कुछ देर रूककर बोला "माँ आप तो जानती ही हैं कि मैं एक सच्चाई की लड़ाई लड़ रहा हूँ, लेकिन माँ मैं बिलकुल अकेला हो गया हूँ, कोई भी नहीं है मेरे साथ" उदासी भरी आवाज़ में आकाश ने कहा  कुछ रूककर फिर बोला "आज के दौर में झूठ भागता है और सच के जैसे पाँव ही ना हों ऐसे लँगड़ा चलता है।  झूठों की जय जयकार होती है और सच्चे की तरफ कोई देखता तक नहीं।"
"सत्य के साथ रहने वालों का यही हाल होता है।  वह हमेशा अकेला ही खड़ा होता है और भीड़ झूठे के साथ होती है। " माता ने कहा
"तो फिर आप इस सिस्टम को सुधारते क्यों नहीं ? " आकाश ने शिकायत भरे लहज़े में कहा।
"यह सिस्टम भी तुम इंसानों का ही बनाया हुआ है।" कुछ देर रूककर माता फिर से बोलीं "मगर एक बात हमेशा याद रखना  कि झूठ के पाँव नहीं होते और वो ज़यादा दूर तक दौड़ नहीं सकता और सच एक सूरज के सामान है जिसे उजागर होने से कोई रोक नहीं सकता।" कुछ देर रुक कर माँ ने फिर कहा बस इतना याद रखना "बुरे कर्म करते समय इंसान यह भूल जाता है कि उसके कर्म ही उसके भाग्य का फैंसला करेंगे। तुम्हारे कल के किये हुए कर्म ही तुम्हारा आज का भाग्य है और तुम्हारे आजके किये हुए कर्म ही तुम्हारे कल का भाग्य तय करेंगे। इसलिए अपने कर्मो को सुधारो ताकि तुम्हारा कल न बिगड़े।"
"बस माँ, आपके इतना कहने में मेरे सारे सवालों के उत्तर मुझे मिल गए। मैं धन्य हो गया, अपने आप को बड़ा ही हल्का महसूस कर रहा हूँ। "
"तो फिर मैं अब चलती हूँ। " माता ने मुस्कुराते हुए कहा।
"नहीं माँ आज यहीं रुक जाओ। मैं आपके लिए मिठाई लाता हूँ। मैं अपने हाथों से आपके लिए खाना बनता हूँ "
कहता हुआ आकाश भागा भागा सा रसोई घर में गया।
चन्द मिनटों बाद जब वह वापस कमरे में लौटा तो उसने देखा वहां कोई नहीं था। आकाश अपने हाथ वाली प्लेट वहीँ टेबल पर रख कर बालकनी की तरफ भागा, वहां भी कोई नहीं था।

तभी उनको देखते ही एक पडोसी ने ज़ोर से हँसते हुए आकाश से पूछा "अरे..... वो औरत क्या कर रही है ?" और ज़ोर से ठहाका मार कर हंसने लगा।

आकाश मायूस सा कमरे में आकर सोफे पर बैठ गया।
काफी देर वह कमरे में बैठा कुछ सोचता रहा, फिर मन बहलाने के लिए बाहर का एक चक्कर लगा आने का सोचा।

मुख्य दरवाज़ा बंद करके वह निचे उतर ही रहा था कि सामने से सीढियाँ चढ़ कर आते हुए उनके एक और पडोसी ओमप्रकाश ने कहा "अरे आकाश बाबू क्या बात है उस औरत को घर में ही बंद करके अब कही मिल्ट्री को बुलाने तो नहीं न जा रहे है ?" और ज़ोर से ठहाका मार के हंसने लगे।


आकाश मन ही मन फुसफुसाया " जय मातादी " और आगे बढ़ गया। 


ROMY KAPOOR (Kapildev)

Tuesday, March 17, 2015

ख्वाहिशें


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हसरतों की चादर में लिपटी इन ख्वाहिशों को जब भी कभी खोल कर देखने की कोशिश करता हूँ तो सहम जाता हूँ , सोचता हूँ क्या ये ख्वाहिशें कभी पूरी होंगी ? जो ज़िन्दगी से मुझे मिला वह तो कई नायाब तोहफे हैं, मगर फिर भी एक कसक सी क्यों है मेरे दिल में उन ख्वाहिशों को ले कर ? 

सुना है ख्वाहिशें कभी मरती नहीं, उन्हें तो मारना पड़ता है, क़त्ल करना पड़ता है उनका। तो क्या मैंने भी क़त्ल कर दिया अपनी ख्वाहिशों का ? मगर जब ख्वाहिशों को मार  दिया जाता है तो दिल में एक कसक सी रह जाती है, अफ़सोस सा होता है, क्यूं कि ज़िन्दगी एक लम्बा सफर होता है और उस लम्बे सफर को बिताने के लिए भी कुछ ऐसी ख्वाहिशों का पूरा होना बहुत ज़रूरी होता है जिनके सपने हम युवा होते ही देखना शुरू कर देते हैं। 

मुझे लगता है कि उसी युवा अवस्था में देखे गए कुछ सपने ही आगे चल कर ख्वाहिशें बन जाती हैं। 

मगर मैं तो अब उन ख्वाहिशों को हसरतों की चादर में लपेट चूका हूँ, जिसे खोल कर देखने से भी मैं सहम जाता हूं।  

Romy Kapoor (Kapildev)

Monday, February 23, 2015

यादें


               



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"अरे बेटा सोनू अपनी बहन के साथ लड़ क्यों रहा है ? तुम्हारी बड़ी  बहन है , हर समय उससे लड़ता रहता है। " अपनी बूढी आँखों पर गांधी चश्मा, जो की सरक  कर  नाक पर आ गया था, उसी को अपने दाहिने हाथ की बीचवाली ऊँगली से ठीक करते हुए सूरजप्रकाश ने अपने पोते को हल्का  सा डांटते हुए कहा।

"दादाजी देखोना ये बिल्ली मेरी चॉकलेट नहीं दे रही" सोनू ने बड़े ही भोलेपन से अपने दादाजी के पास आकर शिकायत भरी आवाज़ में कहा।
"बेटी प्रीति तुम देदो अपने छोटे भाई की चॉकलेट, तुम तो बड़ी हो ना, मैं तुम्हे कल और ला कर दूंगा। " सूरजप्रकाश ने अपनी पोती को समझाते  हुए कहा।
"दादाजी उसने पहले मेरी दो चॉकलेट खाई। " प्रीति ने भी अपनी आँखों को मलते  हुए दादाजी से शिकायत की।
"कोई बात नहीं बेटा वो छोटा है तुमसे, मैं तुम्हे कल बहुत सारी चॉकलेट ला दूंगा, फिर हम इस बदमाश को एक भी चॉकलेट नहीं देंगे। "
"ठीक है दादाजी " कहते हुए उसने अपनी  हथेलियों में दबा कर रखीं दोनों चॉकलेट अपने छोटे भाई की तरफ फेंक दी।
"बेटा गन्दी बात, ऐसे फेंक कर किसी को चीज़ नहीं देते।  सॉरी बोलो।"
"सॉरी भुख्खड़। " कहते हुए उसने जीभ निकाल कर चिढ़ाने लगी।
"दादाजी देखो ना मुझे भुख्खड़ कहती है। "
लेकिन सूरजप्रकाश मंद मंद मुस्कुराते हुए दोनोंकी इस मीठी सी नोंक झोंक का मज़ा ले  रहे थे। बस इन्ही बच्चों में उनका पूरा दिन कहां व्यतीत हो जात पता ही नहीं चलता था।  
तभी दरवाज़े पर हो रही दस्तक ने सूरजप्रकाश को चौंका दिया, लगा जैसे किसी गहरी नींद से जाग उठे हों। पहले नाक पर सरक आये चश्मे को ऊँगली से ऊपर किया , चौंक कर कमरे में नज़रें घुमाई वहां न तो निशा थी और ना ही सोनू। उनके चेहरे पर मायूसी सी छा गयी उसी मायूसी के साथ उन्होंने  फिर दरवाज़े पर नज़रें टिका दीं। दरवाज़े पर फिर से ज़ोर की थपथपाहट हुई। उन्होंने अँधेरे में ही दिवार को टटोलते हुए लाइट का स्विच ओन किया, कमरे में रौशनी होते ही फिर अपने चश्मे  को अपनी कांपती ऊँगली से नाक से ऊपर करते हुए घडी की तरफ देखा जो रात के साढ़े आठ का समय दिखा  रही थी। सोहनलाल धीरे धीरे चलकर  दरवाज़े तक पहुंचे और हलके  से दरवाज़ा खोल दिया।  
"अरे अंकल सो गए थे क्या ? मैं कबसे दरवाज़ा खट खटा  रही हूँ। "
दरवाज़ा खोलते ही एक हाथ में खाने की थाली लिए करीब १५-१६ साल की लड़की ने कहा।
निशा नाम था उसका और वो सोहनलाल के पड़ोस में रहती थी।
"बेटी मैंने तुझे कितनी बार कहा, तेरे पापा से और मां से भी कहा कि रोज़  मेरे लिए इतनी तकलीफ ना किया करें, मैं खा लिया करूँगा कुछ भी।" सोहनलाल ने हलके से झिड़की देते हुए कहा। मगर वह दिल में ये जानते थे कि उनकी इन बातों का कोई भी असर नहीं होने वाला था।
"बाबा आप हटिये, जा बेटी तू अंदर जा कर टेबल पर खाना रख दे, ये तो इनका रोज़ का काम है।" पीछे से निशा की मां ने आते हुए कहा। चलिए बाबा टेबल पर खाना रख दिया है, चल कर खाना खा लीजिये। " सोहनलाल का हाथ पकड़ कर उन्हें धीरे से कमरे में लेजाते हुए कहा।
"बहुत ही ज़िद्दी हो तुम, मेरी तो एक भी बात नहीं मानती। " सोहनलाल ने मुस्कुराते  हुए कहा।
सोहनलाल को धीरे से कुर्सी पर बैठाते हुए बोली "हां सुनूंगी पहले आप आराम से बैठ कर खाना खा लीजिये, मैं अभी थोड़ी  देर में आकर बर्तन ले जाउंगी। " फिर अपनी बेटी निशा की तरफ देखते हुए बोली "चल बेटी बाबा को आराम  से खाना खा लेने दे, फिर आकर बर्तन ले आना ।"
देखिये अगर आप ने थोड़ा भी खाना बचाया तो मैं इसके पापा से शिकायत कर दूँगी। " सोहनलाल को हल्का सा धमकाते हुए उसने कहा और मां बेटी  चली गई।
राजीव बत्रा नाम था निशा के पापा का और  उनके बड़े ही कड़े निर्देश थे  सोहनलाल का  पूरी तरह  से ध्यान रखने का ।

बड़ा ही ध्यान रखते थे सभी, बिलकुल अपने घर के सदस्य की तरह। राजीव खुद भी ऑफिस से आकर तबतक उनके पास बैठा रहता जबतक सोहनलाल सो नहीं जाते।

खाना सोहनलाल के सामने पड़ा था, तभी जैसे अंदर से आवाज़ आई "सुनो आप क्या कर रहे हो ? कब से खाना टेबल पर रखा हुआ है, आपको कबसे आवाज़ लगा रही हूँ , खाना ठंडा हो रहा है। " आवाज़ उनकी पत्नी  की थी।
"हां....हां सुनलिया, बच्चों को आ लेने  दो फिर साथ में बैठ कर खाना खाते हैं। " सोहनलाल ने अंदर ही से आवाज़ दी।
सुनते ही उनकी पत्नी ने सर पर हाथ मारते हुए कहा "ये लो और सुनो छत्तीस बार कह चुकी हूँ कि  वह लोग आनंद बेटे की ऑफिस के एक साथी के वहां एक पार्टी थी सो रात का खाना खा कर ही आएंगे ."
"ओहो तो फिर तुम हमारे साथ बैठ कर खाना खाओ ! " रसोई घर में पीछे से आकर अपनी पत्नी को कमर से पकड़ते हुए सोहनलाल ने कहा !
"अरे क्या कर रहे हो ? छोडो !" उनकी पत्नी सुशीला ने छट पटाते हुए कहा।
"लो छोड़ दिया !" सोहनलाल ने अपनी पत्नी को छोड़ते हुए कहा।

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"अब आप जकर टेबल पर बैठो, मैं खाना गरम कर के लाती हूँ  फिर दोनों साथ में बैठ कर खाएंगे। "
खाना खाने दोनों साथ ही बैठे थे, सोहनलाल ने एक निवाला तोड़कर प्यार से अपनी पत्नी के मुह में डाला .....!
"अरे बाबा , आपने अभीतक खाना शुरू भी नहीं किया ? क्या कर रहे हैं ? क्या सोचते रहते हैं ? निशा ने कमरे में प्रवेश करते हुए सोहनलाल को एक साथ ही कई सवाल पूछ लिए ।
सोहनलाल का निवाला खिलाने  वाला हाथ वहीँ रुक गया, वह जैसे किसी गहरी नींद से जागे।   
"बेटी मैंने अभी तुम्हारी ऑन्टी को देखा.....हम दोनों साथ में बैठ कर खाना खा रहे थे...ये देखो..." सोहनलाल ने थाली की तरफ देखते हुए कहा, मगर थाली को देखते ही उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं, अपनी नाक पर सरक आये चश्मे को ठीक करते हुए उन्होंने निशा की तरफ देखा ।
"कहाँ से खाना खाया ? थाली तो वैसी ही पड़ी हुई है, एक भी निवाला नहीं टुटा, अब मैं यही बैठती हूँ, आप बस अब जल्दी से खाना फिनिश करो " निशा समझ गई थी कि वह फिर किन्ही यादों में खो गए थे। 
सोहनलाल के खाना खाने के बाद वह बर्तन लेकर जाते हुए कह गई "पापा अभी आये है, खाना खाकर आपसे मिलने आएंगे "

सोहनलाल वहीँ बैठे रहे। कुछ देर बाद फिर कुछ यादें चलचित्र की तरह उनकी आँखों के सामने घूमने लगी।

"पापा आपने खाना खा लिया क्या ?" उनके बेटे सरीन ने कमरे में दाखिल होते हुए सोहनलाल से पूछा।
"अरे आ गए तुम लोग पार्टी से ?" अपने  बेटे, बहु और बच्चों को देख कर ख़ुशी जताते हुए पूछा।
"दादाजी मैंने दो-दो आइसक्रीम खाई।" सोनू ने अपने दादाजी के पास आते हुए बड़ी ही ख़ुशी से कहा।
"और दादाजी मैंने तीन आइसक्रीम खाई। " उनकी पोती ने भी चहकते हुए कहा।
"अरे बाप रे, इसका मतलब तुम दोनों ने खाना नहीं खाया सिर्फ आइसक्रीम ही खाई। सोहनलाल ने चुटकी लेते हुए कहा।
तभी उनके बेटे सरीन ने बीच में दखल अंदाज़ी करते हुए कहा "चलो अब बातें कल करना कपडे बदलो और सो जाओ व दादाजी को भी सोने दो। "
"पर पापा कल तो छुट्टी है। " नन्हे सोनू ने तपाक से उत्तर दिया। 
"छुट्टी है तो रात के बारह बजे तक जागते रहोगे ? चलो दादाजी के साथ अब सुबह खेलना। " सरीन ने कहा।
"कल सुबह तो मुझे बाहर जाना है " सोहनलाल ने अपने बेटे की तरफ देखते हुए कहा "मेरा एक मित्र है उसीकी लड़की के लिए लड़का देखने जाना है, वह मुझ पर बड़ा ही ज़ोर डाल रहा है कि मैं भी उसके साथ चलूँ।"
"तो पापा आप को अब सोजाना चाहिए, इनका बस चले तो ये पूरी रात ना सोने दें।" फिर दोनों बच्चों की तरफ देखते हुए बोले "चलो अब दादाजी को भी सोना है।"
"दादाजी गुड नाइट, आप जल्दी आना " नन्हे सोनू ने कहा तो सोहनलाल बस मुस्कुराते रहे।

सुबह होते ही सोहनलाल अपने मित्र के साथ दुसरे शहर जाने के लिए निकल गए।

सुबह करीब दस बजे का समय था सोहनलाल अपने मित्र के साथ लड़के वालों के घर बैठे थे कि तभी लड़का बद हवासी में दौड़ता हुआ वहाँ आते हुए बोला " अंकल आपके शहर में बड़ा भारी भूकम्प आया है काफी जान माल का नुक्सान हुआ है।  इस समय टीवी पर यही न्यूज़ चल रही है।
सुनते ही सोहनलाल व उनके मित्र के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं।
सोहनलाल ने तुरंत अपने फ़ोन से अपने बेटे का फोन लगाया, मगर लाइन नहीं जा रही थी।
कई बार प्रयत्न करने पर भी जब फोन नहीं लगा तो घबराये से सोहनलाल ने अपने मित्र की तरफ देखा, वह भी अपने घर संपर्क करने की कोशिश कर रहा था।
"यार मेरा दिल बहुत घबरा रहा है, हमें तुरन्त ही यहाँ से चलना चाहिए। "  सोहनलाल ने कहा
"हाँ चलो। " उनके मित्र ने भी हामी भरी तो दोनों ही बदहवासी सी हालत में भाग लिए।


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घर के पास पहुँचते ही जब सोहनलाल ने सामने का दृश्य देखा तो उनकी टाँगे कांपने लगीं, दिल बैठने लगा व उनका पूरा शरीर ठंडा पड़ गया। एक कदम बढ़ाना भी उनके लिए मुश्किल हो रहा था , उनका पूरा  घर ही नहीं बल्कि अड़ोस पड़ोस के घर भी ध्वस्त हो चुके थे। तभी पास ही से गुज़रते रेस्क्यू ऑपरेशन के एक जवान से कुछ जानकारी लेने की कोशिश की तो उसने बताया "घर में जो लोग थे उनके बचे होने की  उम्मीदें तो बहुत ही कम हैं, जो घर से बाहर थे वही बच गए होंगे।" कहता हुआ वह जवान आगे बढ़ गया।
सुनते ही सोहनलाल की रही सही हिम्मत भी खत्म हो गयी।
वह वहीँ बेहोश होकर गिर गए।

जब उन्हें होश आया तो उन्होंने अपने आपको एक हस्पताल में पाया।
अपने आप को संभालते हुए वह फिर अपने घर की तरफ चल दिए। जब वह घर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि काफ़ी मलबा हटाया जा चूका था व कुछ शरीरों को मलबे में से निकला जा चूका था।  जितने भी शरीर मलबे से निकले गए थे उनमे कोई भी जीवित नहीं था। उन पारथिव  शरीरों को एक जगह पर सफ़ेद कपडे से ढके हुए थे।

हिम्मत करके सोहनलाल आगे बढे व मुह पर से कपडा हटा हटा कर अपनों  को ढूंढने लगे।  बड़ी हिम्मत चाहिए और सोहनलाल को भी अपनी सारी हिम्मत जुटानी पड़ी। तभी अचानक उनके मुंह से चीख निकल गई, शव उनके बेटे का था। कुछ ही देर में उनके परिवार के सारे शव मिल गए, कोई भी जीवित नहीं था। सोहनलाल का जी चाह  रहा था कि वह दहाड़ें मार मार के रोएँ। वह बिलकुल अकेले रह गए थे।
वह रोते हुए चिल्ला चिल्ला कर कह रहे थे कि  "उनके पोता और पोती ने रात को कहा था 'दादाजी आप जल्दी वापस आना, फिर हम खेलेंगे ' अब मैं आ गया हूँ तो  वह बोल ही नहीं रहे " वह अपना दिमागी संतुलन खो चुके थे   व पागलों की तरह बाते कर रहे थे।
राजीव से उनका यह दर्द देखा नहीं गया और वह उन्हें अपने घर ले आये। तभी से सोहनलाल की पूरी ज़िम्मेदारी उन्होंने उठा ली थी व उनका ध्यान पूरी तरह अपने ही घर के किसी बुज़ुर्ग सदस्य की तरह रखते थे।

खाना खा कर जब राजीव कमरे में आया  तो उसने देखा सोहनलाल खाने की टेबल पर ही सर रख कर सो गए हैं। राजीव ने पास आते हुए जब उन्हें उठाने के लिए उनके कंधो को हिलाया तो उनका शरीर एक तरफ लुढक गया। घबराये से राजीव ने जब उनके शरीर को चेक किया तो पाया वह एकदम ठंडा पड़ गया था।

सोहनलाल ने उस भूकम्प में अपने पूरे परिवार को खो दिया था वह बिलकुल ही अकेले रह गए थे। मगर जब तक ज़िन्दगी थी जीना तो था। क्यूंकि मांगे से अगर मौत मिल सकती तो शायद दुनिया में कोई भी दुःख नहीं झेलता। उन्हें भी न चाहते  हुए भी ज़िंदगी तो जीनी पड़ी थी।
लेकिन आज वह भी चल दिए अपने बिछड़े परिवार से मिलने।

कितना मुश्किल हो जाता है किसी हादसे में अपने पूरे परिवार को खो देना और संसार में बिलकुल अकेले रहना। सिर्फ यादें ही होतीं हैं जिनके सहारे ज़िन्दगी चलती रहती है।

Romy Kapoor (Kapildev)


Saturday, February 7, 2015

माली

"पापा मैं नौकरी करने के लिए दुबई जाना चाहता हूँ, यहां की कंपनी बंद होने के बाद मैंने बहुत जगह पर कोशिश की मगर कहीं नौकरी नही मिल रही।" प्रवीण ने रात का खाना खाने के बाद जब अपने पिता सूरजप्रकाश से कहा तो वह कुछ देर तक आँखे फाड़े उसे देखते रहे।

"दुबई ?" सूरजप्रकाश ने कुछ देर रूककर बोलना शुरू किया "बेटा, तुम्हे तो पता है एक छोटी सी परचून की दुकान है, दो वक़्त की रोटी भी बड़ी मुश्किल से निकलती है और जब से तुम्हारी नौकरी गई है तबसे तो बड़ी ही दिक्कत हो रही है, दुबई जाने का पैसा कहां से आएगा ?"


"पापा अगर मैं दो तीन साल दुबई लगा कर आ गया तो मेरी लाइफ बन जाएगी और हमारी यह पैसों की दिक्कत भी खत्म हो जाएगी। " प्रवीन ने अपने पिता को समझाते हुए कहा।


"मगर इतना पैसा आएगा कहां से ?"


"पापा आप कुछ भी करो, कहीं से उधार लेलो, मैं वहां से कमा कर आऊंगा तो आपको लौटा दूंगा तो आप उधार चुकता कर देना। " प्रवीन ने अपने पिता को समझाते हुए कहा तो सूरजप्रकाश कुछ देर युहीं शुन्य में देखते रहे फिर बोले

"लेकिन कौन देगा इतना पैसा ?"

"पापा इस मकान को गिरवी रखदो।" प्रवीन एक ही सांस में कहने के बाद अपने पिता की प्रतिक्रिया देखने लगा।


"क्या ?" फटी आँखों से सूरजप्रकाश ने प्रवीन की तरफ देखा।

"पापा, सिर्फ दो साल की तो बात है मैं वहां से इतना पैसा कमा कर लाऊंगा कि हमारा मकान तो हमारा हो ही जायेगा, हमारी सारी तकलीफें भी दूर हो जाएँगी।"

"मुझे थोड़ा समय दो सोचने का मैं सुबह तक बताऊंगा तुम्हे। मगर बहु और तुम्हारा बेटा शौर्य ?"


"पापा वह आपके साथ ही रहेंगे ताकि आपका भी मन लगा रहे।" प्रवीण ने अपने पिता के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।

पूरी रात सूरजप्रकाश सो नहीं पाये।  उन्होंने बड़ी ही मुश्किलें झेल कर प्रवीन को पढ़ाया लिखाया था। पत्नी के गुज़र जाने के बाद एक उसी का सहारा था, अपने पोते शौर्य के साथ उनका समय कहां गुज़र जाता इसका उन्हें पता ही नहीं चलता।  अब एक तरफ अपने इकलौते बेटे के भविष्य का सवाल था तो दूसरी तरफ मकान ! वह निर्णय नहीं ले पा रहे थे।


सुबह नाश्ता करते हुए प्रवीन के पूछने पर सूरजप्रकाशने कहा

"ठीक है, मैं मकान को गिरवी रख कर पैसों का इंतेज़ाम करता हूँ , मगर ध्यान रहे कि यह मैं सिर्फ तुम्हारे सुनहरे भविष्य की खातिर कर रहा हूँ।" सूरजप्रकाश ने प्रवीन की तरफ देखते हुए कहा।
"पापा आप चिंता ना करें। " कहता हुआ वह अपने पिता के गले लग गया।

कुछ दिन युहीं गुज़र गए।  सूरजप्रकाश ने अपना मकान गिरवी रख दिया और उससे दो साल में सारे पैसे देकर मकान को छुड़वाने का वायदा किया। तबतक सूरजप्रकाश अपनी बहु और पोते के साथ उसी मकान में रह सकते थे। दो साल की मियाद पूरी होने पर पूरा पैसा ब्याज सहित नहीं लौटा पाने पर उन्हें वह मकान खाली करना होगा, इन्ही शर्तों पर उन्होंने अपना मकान गिरवी रख दिया था। 


"प्रवीन, तुम्हारी मां इसी माकन में  पहली बार जब आई थी तब वह बहुत ही खुश थी, उसने अपनी पूरी ज़िन्दगी यहां बिताई और दम भी इसी माकन में तोडा। मैं चाहता हूँ कि जिस घर के साथ तुम्हारी मां की इतनी यादें जुडी हुईं हैं, मेरा दम भी उसी घर में निकले। मैं चाहता तो नहीं था इस माकन को गिरवी रखना मगर तुम्हारे सुनहरे भविष्य की खातिर मैंने यह कदम उठाया है , इसलिए कि तुम खूब पैसा कमा कर आओ। " सूरजप्रकाश ने प्रवीन के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।

"पापा आप चिंता नहीं करो मैं आपको निराश नहीं करूँगा।" प्रवीन ने पिता को विश्वास दिलाते हुए कहा।


प्रवीण की पत्नी सरोज भी बहुत खुश थी, मगर उसे इस बात का भी ग़म था कि उसे इतना लम्बा समय अपने पति से दूर रहना होगा।

"उदास क्यों होती है ? मैं तेरे लिए बहुत पैसे कमा कर लाऊंगा और फिर तुझे रानी बना कर रखूँगा।" प्रवीण ने अपनी पत्नी के चेहरे की उदासी को देखते हुए कहा। "तुम्हारे पास तो शौर्य भी होगा, तुम्हारा मन लगा रहेगा, मैं तो वहां अकेला ही होऊंगा, अगर तुम इस तरह मायूस होगी तो मेरा जाना मुश्किल होगा, इसलिए मुस्कुराओ और मुझे अच्छी सी चाय बना कर पिलाओ।"

नन्हा शौर्य पास ही खेल रहा था, सारी बातों से अनजान, ना किसी के आने का पता न किसीके जाने का।


आखिर वह दिन भी आ गया, आज प्रवीन दुबई जा रहा था। परिवार के इलावा उसके कई दोस्त भी एयरपोर्ट पर बिदा करने आये थे, प्रवीन ने अपने बेटे शौर्य को गोद में उठा रखा था, उसकी पत्नी उसकी बगल में खड़ी थी, आँखें भरी हुईं व चेहरे पर उदासी, पास ही सूरजप्रकाश भी खड़े थे।


अनाउंसमेंट होने पर प्रवीन अपने पिता के पांव छूते हुए बोला

"पापा मैं आपका यह एहसान ज़िंदगी भर नहीं भूलूंगा, मैं बहुत जल्दी  ही आपका क़र्ज़ उतार दूंगा। 

"सूरजप्रकाश ने अपने बेटे को गले लगा लिया, गला भरा होने की वजह से वह कुछ बोल नहीं पाये।


"सरोज अपने ये आंसू पोंछ लो, दो साल  तो बस  युहीं गुज़र जायेंगे, शौर्य का ध्यान रखना।" सरोज के पास आते हुए प्रवीन ने कहा। 

प्रवीण चला गया।

सूरजप्रकाश अपनी बहु और पोते के साथ घर वापस आकर यु ही गुमसुम से बैठ गए।


"बहु प्रवीन के जाने के बाद घर कितना सूना सूना लग रहा है ?" फिर कुछ देर युही शुन्य में देखते रहने के बाद बोले "बिलकुल शौर्य जितना था, जब भी मैं दुकान जाने के लिए निकलता तो रोने लगता, कहता मुझे भी साथ जाना है, बड़ी मुश्किल से उसकी मां उसका ध्यान दूसरी तरफ लगाती तब कहीं जा कर मैं निकल पाता था। 


कई बार तो उसकी मां को इतना तंग करता कि वह उसे दुकान पर ही ले आती, दुकान पर कभी चॉकलेट, कभी बिस्कुट तो कभी बुढ़िया के बाल, बड़ी ही मस्ती करता था, मेरी तो जान था, पता ही नहीं चला वो कब बड़ा हो गया, इतना बड़ा हो गया कि अकेला दुबई भी चला गया !" सूरजप्रकाश ने अपनी भीगी आँखों को पोंछते हुए कहा।

सरोज भी उदास थी, शौर्य पास ही में सोया हुआ था।



समय बीतता रहा, प्रवीन को दुबई गए पूरा एक वर्ष बीत गया था, पहले तो वह रोज़ ही फोन करता था मगर वह सिलसिला धीरे धीरे कम होता गया और अब तो महीने में एकाध बार उसका फोन आ जाता था, उसने कुछ महीने पैसे भी भेजे मगर अब वह भी भेजने बंद हो गए थे। सूरजप्रकाश को अपनी छोटी सी दुकान से तीन लोगो का खर्च चलाना भी मुश्किल हो गया था।  कई बार उन्हें किसी न किसी से थोड़ा बहुत उधार भी लेना पड़ता था। वह इस बात से परेशान तो थे ही।

इसी तरह दो साल बीत गए, आखिर वो दिन भी आ गया जब प्रवीन घर वापस आ रहा था। सूरजप्रकाश, सरोज व शौर्य को लेकर एयरपोर्ट पहुँच गए थे।


"सरोज। …पापा ! प्रवीन एयरपोर्ट से  बाहर  निकलते  हुए अपनी पत्नी और पिता को देखते ही दूर से ही चिल्लाया।

सूरजप्रकाश अपने बेटे को देख कर बहुत ही खुश थे।  पास पहुंचते ही उन्होंने अपने बेटे को गले लगा लिया।  शौर्य को देख कर परवीन ने उसे गोदी  में उठाते हुए कहा "अरे शौर्य कितना बड़ा हो गया ?"

सूरजप्रकाश देखकर बहुत ही खुश थे, उन्हें लग रहा था जैसे प्रवीन के आने के साथ उनका अधूरा परिवार फिर पूरा हो गया था, कमी थी तो सिर्फ उनकी पत्नी की।


प्रवीन को वापस लौटे पूरा एक हफ्ता बीत गया था, सूरजप्रकाश रोज़ इसी उम्मीद में रहते कि शायद आज प्रवीन पैसों के बारे में उनसे कोई बात करेगा, मगर अभीतक उसने कोई भी बात नहीं की थी। एक रात सूरज प्रकाश ने खुद ही बात छेड़ते हुए प्रवीन से पूछा

"बेटा वो पैसे कब लौटाओगे ? अब तो एक दो दिन में देनदार भी पैसे मांगने आ जायेगा, और पैसे नहीं देने पर तो घर खाली करना पद सकता है।"

प्रवीण ने अपनी पत्नी को देखा, कुछ देर चुप रहने के बाद बोला

"ठीक है पापा दो तीन दिनों में मैं इसका कोई रास्ता निकालता हूँ।" कहता हुआ वह दूसरे कमरे में चला गया, सरोज भी उठ कर उसके पीछे पीछे चलदी।

बात वहीं ख़त्म हो गई, सूरजप्रकाश के चेहरे पर चिंता के भाव साफ नज़र आ रहे थे, किन्ही गहरी सोचों में डूबे वह कब सो गए पता ही नहीं चला मगर प्रवीन और उसकी पत्नी रात देर तक ना जाने क्या खुसुर फुसुर करते रहे।


दो दिन बाद सूरजप्रकाश रात का खाना खा कर बैठे थे कि प्रवीन ने कहा

"पापा हम कल सुबह बाहर जा रहे हैं, आप अपना बैग तैयार कर लेना, कपडे व अन्य ज़रूरी सामान रख लेना।"
"मगर बेटा हम जा कहां रहे रहे हैं ?" सूरजप्रकाश ने पूछा।
"पापा पैसों का इन्तज़ाम करना है ना, जल्दी ही आ जायेंगे।" प्रवीण बोला।

"पैसों का इन्तज़ाम ? मैं कुछ समझा नहीं। "

"पापा मैं आप को सब समझा दूंगा, आप बस सुबह तैयार हो जाना। "
"ठीक है मगर जाना कितने बजे है ?" सूरजप्रकाश ने पूछा तो उनकी आवाज़ में एक छिपा हुआ भय भी था।
"बस यही कोई १०-११ बजे। "
सूरजप्रकाश सो गए।

सुबह उठते ही सूरजप्रकाश ने अपना बैग तैयार कर लिया।नहा धोकर नाश्ता करके बैठे ही थे कि प्रवीन ने पूछा

"पापा आप तैयार हैं ? चलें ?"
"हाँ तैयार तो हूँ मगर हम जा कहां रहे हैं और कितने दिन के लिए जा रहे हैं?"
"पापा क्या आप को मुझ पर भरोसा नहीं है ?"
"बेटा इस बुढ़ापे में तुम्हारे भरोसे ही तो जी रहा हूँ,  मगर शौर्य से तो मिला नहीं, वह तो स्कुल गया हुआ है।"
"उसे तो आने में अभी काफ़ी टाइम है, हम लेट हो जायेंगे।" प्रवीन बोला और उठ कर ऑटो लेने चल दिया।  
ऑटो में बैठते हुए जब सरोज ने अपने ससुर के पाँव छुए तो उन्होंने ढेर सारा आशीर्वाद देते हुए कहा
"बेटा सदा खुश रहो, बहुत सारा सुख मिले तुम्हे, शौर्य भी पढ़ लिख कर बड़ा आदमी बने और बहुत साड़ी खुशियाँ  दे तुम लोगों को, शौय से कहना मैं आते हुए उसके लिए बहुत सारी चॉकलेट लाऊंगा,उसे ढेर सारा प्यार देना मेरी तरफ से।" कहते हुए उनकी आँखों से आंसू बाह निकले।
अॉटो चल पड़ा, सूरजप्रकाश मुड़ मुड़ कर काफी दूर तक पीछे देखते रहे।

करीब चालीस मिनट बाद ऑटो एक स्थान पर रुका, यह शहर से दूर एक जगह थी। ऑटो से उतर कर बड़ी ही उत्सुकता से सूरजप्रकाश चारों तरफ देखते रहे, चारों तरफ खेतों के बीच में एक कोठी नुमा मकान था। मकान के अंदर दाखिल होते ही प्रवीन ने एक बेंच की तरफ इशारा करते हुए कहा "पापा आप यहाँ बैठिये मैं अभी आता हूँ।" कहता हुआ वह सीढियाँ से ऊपर की तरफ चला गया।


सूरजप्रकाश यह सब बड़े ही अचरज से देख रहे थे। सामने लॉन  में चार पांच बूढ़े पुरुष व दो महिलाये बैठे बातें कर रहे थे। वह भी बड़ी ही उत्सुकता से सूरजप्रकाश की तरफ देख रहे थे।


करीब दस मिनट बाद प्रवीन आया और सूरजप्रकाश का बैग उठाते हुए बोला "आइये पापा " पहली मंज़िल पर जा कर एक कमरे में एक बेड के ऊपर उनका बैग रखते हुए बोला "बैठिये।"सूरजप्रकाश ने नज़रें घुमा कर देखा, वहां करीब दस बेड लगे हुए थे, वहां बाकी के नौ पर कुछ न कुछ सामान रखा हुआ था, पांच बेड पर कुछ बूढ़े आदमी सोये हुए थे।

"बेटा यह क्या है ?" प्रवीन की तरफ नज़रें घुमा कर देखते हुए उन्होंने पूछा।


"पापा वो.........."
"नहीं बोल पा रहे हो ?" दरवाज़े से अंदर प्रवेश करते हुए एक व्यक्ति जिसकी उम्र करीब चालीस के आस पास की रही होगी, ने प्रवीन की तरफ देखते हुए पूछा। फिर वह सूरजप्रकाश की तरफ मुखातिब होता हुआ बोला "मेरा नाम देवेन्द्र पारीख है, मैं यहाँ का ट्रस्टी हूँ, यह "ओल्ड ऐज होम" है, लोग यहाँ अपने बूढ़े मां बाप को छोड़ जाते हैं।"
"ओल्ड ऐज होम ?" बड़े ही अचरज से सूरजप्रकाश ने प्रवीन की तरफ देखते हुए कहा "बेटा यहां क्यों लाये हो मुझे ?"

"पापा थोड़े दिनों में मकान का इन्तज़ाम हो जायेगा तो मैं आपको यहां से ले जाऊंगा।" प्रवीण ने सर झुकाये हुए ही उत्तर दिया।


"मकान का इंतज़ाम ? मतलब ? तुम तो मुझे पैसे देने वाले थे ? उस मकान को गिरवी रख कर मैंने तुम्हे परदेश भेजा था, तब तुमने मुझे कहा था कि तुम वापस लौटते ही मुझे  पैसे लौटा दोगे और वह मकान छुड़वा लोगे।"


"पापा मैंने आपसे कहा ना मैं जल्द ही आपको यहां से लेजाऊँगा।" प्रवीन नज़रें नहीं मिला पा रहा था।

"बेटा मैंने तुम्हे पाल पोस कर बड़ा किया, तुम्हे परदेश भेजा ताकि तुम्हारा भविष्य बन जाए और तुम मुझे यहां ले आये ?" सूरजप्रकाश का गला भर आया, वह कुछ बोल नहीं पा रहे थे, आँखों से आंसू छलक आये।

देवेन्द्र पारीख ने उनके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा

"आप धीरज रखिये, यहां हमारी तरफ से आपको कोई तकलीफ नहीं होगी, आपके अपने तो यहां नहीं होंगे मगर यहां सभी एक दूसरे के साथ बड़े ही स्नेह से रहते हैं।" कुछ देर रुक कर वह फिर बोला "हमारे मम्मी पापा ने हमें पाल पोस कर बड़ा किया था लेकिन जब हमारी बारी आई उनकी सेवा करने की तब वह इस दुनिया से चले गए थे। दोनों का एक कार एक्सीडेंट में निधन हो गया था, तभी से हम दोनों भाइयों ने यह ओल्ड ऐज होम खोल दिया और अब आप जैसे बेसहारा लोगों की सेवा कर के हमारे मन को बड़ा ही सुकून मिलता है।"
प्रवीन चुप था नज़रें झुकी हुईं थीं।

सूरजप्रकाश ने प्रवीण की तरफ देखते हुए कहा

"बेटा मैं तुम्हारे घर का सारा काम करदूंगा, झाड़ू, बर्तन, पोंछा , सब कुछ, मैं तुमसे पैसे भी नहीं मांगूगा, मगर मुझे परिवार से अलग मत करो, मुझे शौर्य से दूर मत करो, अभी तो मैंने शौर्य को ठीक से खिलाया भी नहीं। " सूरजप्रकाश ने हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाते हुए प्रवीण से कहा।

"पापा आप समझते क्यों नहीं ?" प्रवीण ने झल्लाते हुए कहा। मैंने आपसे एक बार कहा तो है कि मैं आपको जल्द ही यहां से ले जाऊँगा।" 


अपने सारे प्रयासों के बाद भी जब प्रवीन नहीं माना तो सूरजप्रकाश अपने घुटने टेक दिए।  अपनी आँखों के आंसू पोंछते हुए अपनी जेब में हाथ डाला और सौ रुपये का एक नोट निकाल कर प्रवीन के हाथ में थमाते हुए बोले 

"ठीक है बेटा, ये लो सौ रपये, मैं शौर्य को तो मिला नहीं था, उसके लिए कुछ चॉक्लेट्स ले जाना, वो खुश हो जायेगा, अब मैं तो जा नहीं रहा तो तुम ही मेरी तरफ से शौर्य के लिए चॉक्लेट ले जाना, वो बहुत खुश हो जायेगा, मेरी तरफ से ढेर सारा प्यार देना उसे, ध्यान रखना उसका। " कहते हुए सूरजप्रकाश की आँखें भर आईं। 
"पापा मैं ले जाऊंगा, इसे आप अपने पास ही रखिये आपको ज़रूरत पड़ेगी। "

"मुझे अब इसकी क्या ज़रूरत ? यहां से खाना मिल ही जायेगा। "

अपने हाथ में सौ का नोट लेते हुए प्रवीन बोला "अच्छा पापा अब चलता हूँ। "


"बेटा शाम को घर जल्दी आ जाया करना, शौर्य और बहु घर पर पूरा दिन अकेले रहेंगे, अपना ध्यान रखना और काम काज में ध्यान लगाना, भगवन तुझे बड़ी तरक्की दे।" अपनी आँखों को पोंछते हुए फिर बोले "बेटा अगर तुमने घर पर ही बोल दिया होता तो तुम्हारी मां की फ़ोटो ही ले आता अकेले बैठे उसीसे बातें कर लेता।" कहते कहते उनकी आँखों से आंसू टपकने लगे। 

प्रवीण ने एक बार उनकी तरफ देखा और पलट कर सीढियाँ उतरने लगा। सूरजप्रकाश भी घबराये से उसके पीछे भागे। प्रवीण बिना रुके ही मुख्य द्वार से बाहर निकल गया। सूरजप्रकाश मुख्य द्वार पर ही रुक गए, शायद अब यही उनकी सीमा बन गयी थी, प्रवीन को जाता देख भर्राई आवाज़ में ज़ोर से चिल्लाये "शौर्य को लेकर आना एक बार मिलवाने के लिए।"



उनकी आंखें आंसुओं से भरी पड़ी थीं, दिल चाह  रहा था कि दहाड़ें मार मार के रोएँ, दूर जाते प्रवीन की तस्वीर भी अब धुंधली सी दिखाई दे रही थी।  बेबस से वहीँ बैठ गए, घुटनों के ऊपर अपना सर रख दिया और सिसक सिसक कर रोते रहे, न जाने कब तक ?

प्रवीन के बचपन की यादें उनके ज़हन में घूम रही थीं, जब वह उसे दुकान भी नहीं जाने देता था, वही आज उन्हें खुद यहां छोड़ गया।  
एक माली जिसने सींच कर एक पौधे को बड़ा किया, आज माली अकेला खड़ा था, ना उस पेड़ की छाया थी और ना ही उसका सहारा। 
जिस बेटे के सुन्दर भविष्य के लिए उन्होंने अपने घर को गिरवी रख दिया, वही बेटा उन्हें घर से बे घर कर गया !  

क्यों होता है ऐसा ? 

क्यों ओल्ड ऐज होम की संख्या इतनी बढ़ती जा रही है ? 
क्यों आजकल के बच्चे अपने मां बाप को पाल नहीं सकते, उन्हें जिन मां बाप ने उन्हें पाल पोस कर इतना बड़ा किया ?
क्यों एक माली, जिसने एक बाग़ को इतने सालों सींचा, उसे ही अपने बाग़ से बाहर निकाल दिया जाता है ?
क्या इसका कारन सोशियल सिक्योरिटी का ना होना हो सकता है ?

क्या ये मुद्दा सरकार के लिए एक चेतावनी नहीं है ?


Romy Kapoor (Kapildev)






Thursday, January 1, 2015

तक़दीर


"मां, बाबा से कहो ना मुझे भी एक अच्छा मोबाइल फ़ोन लाकर दें, अब मैं कॉलेज में आगई हूँ और हमारी कॉलेज में सभी मोबाइल फोन लेकर आते हैं, सभी एक दुसरे से मोबाइल फ़ोन पर बातें करते हैं, मैसेज करते हैं, और अगर किसी दिन कॉलेज में नहीं आएं तो फ़ोन करके पूछ लेते हैं, अच्छी अच्छी गेम खेलते हैं।" दीपा ने अपनी माँ से कहा।
"बेटा, तुझे तो पता है तेरी कॉलेज की फीस व तेरे कॉलेज के दुसरे खर्चे, फिर घर के खर्चे, ये सब पूरा करते करते तेरे बाबा समय से पहले ही बूढ़े दिखने लगे हैं। मज़दूरी में मिलता ही कितना है ? बस किसी तरह पेट काट काट कर तुझे पढ़ा रहे हैं, तांकि जो गरीबी हमने देखि है वो तुझे ना देखनी पड़े।" दीपा की मां ने उसे समझाते हुए कहा।

दीपा मां की बात सुन कर चुप तो होगई, मगर उसकी दिली इच्छा थी कि उसके पास भी एक अच्छा सा मोबाइल फ़ोन हो, वह भी अपनी सहेलियों से मोबाइल फ़ोन पर बातें करे, फोटो खींचे।  उसने मोबाइल फ़ोन की फरमाइश एक दो बार अपने माँ बाबा से पहले भी की थी, मगर उसके बाबा ने कोई भी उत्तर नहीं दिया था।

उसके बाबा एक बिल्डिंग कांट्रेक्टर के वहां मज़दूरी करते थे। रोज़ की दोसो रुपये दहाड़ी मिलती थी, इन्ही पैसों से गुज़ारा करना पड़ता था। छोटा सा एक कमरे का मकान था, वह भी तब हुआ जब टाउन प्लानिंग के तहत कारपोरेशन ने शहर में से झुग्गी झोपड़ियां हटाने का फैंसला लिया, लेकिन उन लोगों के कड़े विरोध के बाद सरकार की तरफ से उन्हें शहर के बाहर इस तरह के मकानों का आबंटन किया गया था।

शाम को जब हरिया घर लौटा तो रात का खाना खाने के बाद जब दीपा सो गई तो हरिया की पत्नी ने कहा "आज फिर मोबाइल फ़ोन की फरमाइश कर रही थी। आप पता तो करो कितने का आता है फ़ोन ? मैंने थोड़े पैसे जोड़े हैं, यही कोई बारहसौ - तेरहसौ रुपये होंगे, इत्ते का तो आहि जायेगा ? उसे साथ लेजाकर दिलवा दो ना, सभी बच्चे ले कर आते हैं तो उसे भी इच्छा होती है। "
"अरे पागल है तू तो, बहुत महंगा आता है मोबाइल फ़ोन, इतना पैसा जमा करने में तुझे पता नहीं कितना समय लगा, और जमा करने में तो तेरी बाकी की  ज़िन्दगी ही गुज़र जायेगी। अभी पेट काट काट कर तो उसे पढ़ा रहे हैं, महंगाई भी इतनी है, क्या करें ?"
"ठीक है मैं उसे समझा दूंगी,तुम सो जाओ। " हरिया की पत्नी ने कहा और वह खुद भी लेट गई। हरिया अपने सर पर हाथ आड़ा किये लेटा हुआ किन्ही गहरी सोचों में डूबा रहा।

समय बीतता रहा, एक दिन दीपा अपनी कॉलेज में सहेलियों के साथ बैठी थी, तभी एक ने दीपा के हाथ में मोबाइल थमाते हुए कहा
"ले दीपा तु मेरी फोटो खींच ना।" दीपा को उसने कैमरा खोलकर समझाया कि कहां से क्लिक करना है और फ़ोटो कैसे खींचनी है।दीपा के हाथों में मोबाइल फ़ोन आते ही पहले तो उसे बड़ी ही हसरत से  देखा, जैसे कोई नायब चीज़ उसके हाथ लग गई हो, उसके चेहरे की ख़ुशी बता रही थी कि फ़ोन को हाथ में लेकर वह फूली नहीं समां रही थी। चार अलग अलग पोज़ खिंचवाने के बाद जब उसकी सहेली ने फोटो देखे तो वह बड़ी ही हैरानी से दीपा की तरफ देखती हुई बोली
"अरे दीपा तु तो बड़ी ही एक्सपर्ट है, क्या बढ़िया फ़ोटो खींची हैं तुने। तु भी फ़ोन क्यों नहीं ले लेति ?"
"मेरे बाबा मज़दूरी  करते हैं उनके पास इतने पैसे नहीं हैं।" बड़ी ही मायूसी के साथ दीपा ने कहा।
"अरे इस तरह मायूस क्यों होती है, तू मेरा मोबाइल फ़ोन इस्तेमाल किया कर,आ अब मैं तेरी फ़ोटो खींचती हूँ। "
दीपा ने एक मुस्कुरहट दी और फ़ोटो खिंचवाने के लिए खड़ी हो गई।
"देख तो कितनी सुन्दर लग रही है !" फ़ोटो खींचने के बाद दीपा को उसकी फ़ोटो दिखाते हुए उसकी सहेली ने कहा। दीपा मोबाइल फोन में अपनी फ़ोटो देख कर बड़ी ही खुश हुई।
"ले ये फोन आज तू अपने साथ लेजा।" उसकी सहेली ने कहा तो दीपा उसे बड़ी ही अचरज से देखने लगी।  तभी उसकी सहेली ने आगे बोलते हुए कहा "आज घर जा कर अपने मां और बाबा की फ़ोटो खींचना, कल मोबाइल फ़ोन ले आना फिर हम इन सभी की तस्वीरें बनवा लेंगे किसी फोटोग्राफर के पास से।"
पहले तो दीपा ने इनकार किया मगर फिर उसकी सहेली के ज़िद्द करने पर वह मान गई।

दीपा जब घर पहुंची तो वह बड़ी ही खुश नज़र आ रही थी।  उसको इतना खुश देख कर उसकी मां ने पूछा
"क्या बात है दीपा आज इतना खुश क्यों है ?"
दीपा ने तुरंत ही अपने बैग में से मोबाइल फोन निकालते हुए कहा
"देखो मां ये मोबाइल फ़ोन। "
"अरे ये कहां से ले आई ? किसी का चोरी किया है क्या ?" माँ ने पूछा। 
"नहीं मां, मेरी एक सहेली का है। उसने मुझे कहा ये तू आज घर लेजा और अपनी मां - बाबा की फ़ोटो खिंच कर कल ले आना, तो मैं ले आई।" दीपा ने चहकते हुए कहा, उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था।
"लेकिन दीपा इस तरह इतना महंगा फोन वो भी किसी और का लेकर आना ठीक नहीं है, अगर ख़राब हो गया तो ?" उसकी मां ने चिंता जताते हुए कहा।
"मां तुम चिंता मत करो आओ मैं तुम्हारी फ़ोटो खींचती हूँ। " कहते ही दीपा ने अपनी मां की तीन चार फ़ोटो खिंच ली, रात को उसके बाबा के घर लौटने पर कुछ फ़ोटो उसके बाबा की और कुछ मां और बाबा दोनों की खींचीं।

मां और बाबा दोनों ही दीपा के चहरे पर आई ख़ुशी को देख कर बहुत ही खुश थे।
"देख रहे हो फ़ोन के साथ कितनी खुश है !"
"हां देख रहा हूँ। " हरिया ने कहा और किसी गहरी सोच में डूब गया।

दिवाली के दिन थे और ठेकेदार अपने सभी मज़दूरों को बोनस बांट रहा था। बोनस लेने के बाद हरिया ने अपनी जेब से कुछ और पैसे निकाले और उन सभी को गिनने लगा, पुरे पैसे गिनने के बाद वह अपने ठेकेदार के पास गया और बोला
"आप मेरे साथ मार्किट में चलेंगे मुझे एक अच्छा मोबाइल फ़ोन लेना है ?"
पहले तो ठेकेदार ने हरिया को ऊपर से निचे तक बड़े ही गौर से देखा फिर बोला
"मोबाइल फ़ोन ? अरे हरिया दिवाली का टाइम है जा जाके पैसे अपनी बीवी के हाथ में रख दे वो खुश हो जाएगी।" ठेकेदार ने सलाह देते हुए कहा।
लेकिन हरिया ने जब उसे अपनी बेटी की पूरी बात विस्तार से कही तो ठेकेदार ने अपने लड़के को हरिया के साथ मार्किट में भेज दिया।

कुछ सस्ता सा एंड्रॉइड फ़ोन लेकर वह बड़ी ही ख़ुशी ख़ुशी अपने घर की तरफ भागा। हांफ़ते हांफ़ते जब वह अपने घर पहुंचा तो देखा दरवाज़े पर ताला लगा हुआ है, अभी वह कुछ समझ पाता उससे पहले ही आसपास की कुछ औरतें हरिया को देख भागते हुए उसके पास आती हुई बोलीं
"अरे हरिया क्या बात है आज आने में बड़ी देर लगा दी ?"
"हां वो दीपा के लिए मोबाइल फोन लेने गया था।" कहते हुए उसने अपने हाथ वाला फ़ोन का डिब्बा सभी को दिखया।
"जल्दी जाओ तुम्हारी दीपा का तो एक्सीडेंट हो गया है, उसे पास ही के सरकारी अस्पताल में ले गए है, सर पर चोट लगी है उसके।" उनमें से एक ने कहा।
"क्या ?" हरिया के हाथ पैर कांपने लगे, उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी थी, वह तुरंत ही हॉस्पिटल की तरफ भागा। मोबाइल के डिब्बे को उसने कस कर पकड़ रखा था,तरह तरह के ख्याल आ रहे थे उसके मन में।
"अरे आगये तुम ? देखो तो हमारी बच्ची को क्या हो गया है ?" हरिया को देखते ही उसकी पत्नी ने कहा।
दीपा के सर पर पट्टी बंधी हुई थी, उसके हाथ में ग्लूकोज़ की नालियां लगी हुईं थीं और वह बेहोशी की अवस्था में बिस्तर पर पड़ी हुई थी। दीपा की ऐसी हालत देख कर हरिया की आँखें भर आईं, वह भगवान से मन ही मन उसके जल्द ठीक होने की प्रार्थना करने लगा।

फ़ोन हरिया के हाथ में ही था, दीपा के सिरहाने बैठ कर वह उसके होश में आने का इंतज़ार करने लगा।  दीपा की मां के आंसू थम नहीं रहे थे, वह भी उसके सिरहाने बैठी थी।

करीब दो घंटे बाद दीपा को हल्का सा होश आया, अपने सामने अपने माँ और बाबा को खड़ा देख कर उसके होंटो पर हलकी सी मुस्कराहट आई और फिर उसने अपनी आंखें बंद करलीं।

करीब एक घंटे बाद दीपा पूरी तरह से होश में आ चुकी थी। उसे होश में आई देख कर हरिया दीपा के सर पर हाथ घुमाते हुए प्यार से बोला "बेटा तुम ज़रा भी चिंता ना करो, तुम बिलकुल ठीक हो।" 
दीपा अपने बाबा को युही टुकुर टुकुर देखती रही। 
तब तक दीपा की मां भी अपने आंसू पोंछते हुए दीपा  के पास आ गई थी। 
"दीपा, देखो मैं तुम्हारे लिए क्या लाया हूँ ?" हरिया ने मोबाइल फ़ोन का डिब्बा निकाल कर दीपा के हाथ में रखते हुए कहा। 
मोबाइल देख कर दीपा के चेहरे पर ख़ुशी की एक लहर दौड़ गई। मोबाइल के डिब्बे को वह हाथों में लेकर उलट पलट कर देखने लगी। 
"बेटा, अब तू भी रोज़ अपनी सहेलियों से बाते करना,फोटो खींचना, मैसेज करना।" दीपा की मां ने अपनी आंख के आंसू पोंछते हुए कहा।   
"मां,आप इतना धीरे क्यों बोल रहे हो कि मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा। "
"क्या ?" हरिया ज़ोर से चिल्लाया। 
"बाबा मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा। " दीपा ने फिरसे दोहराया। 

हरिया भागा भागा डॉक्टर को बुला कर लाया। 
रूपा के सारे टेस्ट करने के बाद डॉक्टर्स ने अगले दिन हरिया और उसकी पत्नी को बुला कर कहा 
"देखिये, सर पर चोट लगने की वजह से दीपा अपनी  सुनने की शक्ति खो चुकी है, बाद में इसका एक ऑपरेशन करना होगा ,कह नहीं सकते कि वह उसके बाद सुन पाएगी। "
हरिया और उसकी पत्नी पर जैसे कोई पहाड़ आ गिरा, दोनों ही सकते में थे, कुछ भी बोला नहीं जा रहा था और आँखें फटी की फटी रह गई। 
लौट कर दीपा के पास आये, जो अभी भी हाथ में मोबाइल फ़ोन का डिब्बा पकडे हुए थी, लेकिन अब ये पता नहीं था कि वह इस फोन का इस्तेमाल कब कर पाएगी ?
हरिया की आँखों में आंसू थे और वह कुछ देख नहीं पा रहा था, सिर्फ खड़ा सोचता रहा "बेटी इतने समय से मोबाइल फोन मांग रही थी, मैं ला कर नहीं दे पा रहा था और आज जब मैं फोन लेकर आया तो वह सुनने लायक नहीं रही, भगवान यह तेरा कैसा इन्साफ है, ये उसकी तक़दीर में तूने क्या लिख दिया, अगर कोई मुसीबत देनी ही थी तो मुझे दे देता , इस बच्ची को क्यों ?"  

बाहर पटाखों की रौशनी से पूरा आकाश जगमगा रहा था, मगर हरिया को और उसकी पत्नी को लग रहा था जैसे उनकी ज़िंदगी में अँधेरा ही अँधेरा था, अपनी बेटी से छुप कर दोनों ही फूट फूट कर रो रहे थे।  

Romy Kapoor (Kapildev)