Sunday, August 31, 2014

उड़ान- A question




















सुबह का समय था मैं सोफे पर बैठा अखबार के पन्ने पलट रहा था, तभी मेरे मोबाइल की घंटी बजी, मैंने देखा वह मेरे छोटे भाई का फ़ोन था। 
"हेलो" मैंने फोन उठाते हुए कहा। 
"एक खुश खबर है, रोहित को कनाडा का वीज़ा मिल गया है और वह छब्बीस तारीख को आगे की पढाई के लिए कनाडा जा रहा है।" सामने से सूरज ने कहा। 
सुनते ही कुछ पल के लिए मैं बिलकुल चुप ही हो गया, समझ नहीं पा रहा था कि इस समाचार पर कैसे रियेक्ट करूँ ? लेकिन चूँकि सूरज ने मुझे यह समाचार बड़ी ही गर्मजोशी और उत्साह से सुनाया था इस लिए मेरा भी फ़र्ज़ बनता था कि मैं भी उसका उत्तर उसी गर्म जोशी और उत्साह से देता। 
मैंने कहा "अरे, बहुत बहुत बधाई हो, मगर एकदम से अचानक यह सब कैसे हो गया ? तुमने पहले तो कभी बात नहीं की थी।"  
"हाँ लकिन जबसे स्पर्श (मेरी छोटी बहन का लड़का ) कनाडा गया है तभी से उसकी भी यह इच्छा थी कि उसे भी आगे की पढाई के लिए कनाडा जाना है।  इसके लिए वह लम्बे समय से कोशिश भी कर रहा था और फिर मैंने भी सोचा, वहां चला जाएगा तो उसका भविष्य बन जाएगा। बस अब जब सब कुछ तय हो गया तब मैं सभी को बता रहा हूँ। "
"हाँ यह तो सही है, मैं रोहित को बधाई देना चाहता हूँ, मेरी बात करवाओ रोहित से। " 
"वह तो तभी से बहुत ही खुश है, अभी कहीं बाहर गया है, आने पर मैं बात करवा दूंगा।" सूरज ने कहा। 
"चलो ठीक है, मैं शाम को खुद ही आऊंगा उसे बधाई देने।"

बात खत्म होने के बाद मैं काफी देर सोचता रहा। सूरज ने मुझे कहा था कि "उसकी इच्छा थी कनाडा जा कर आगे की पढाई करने की, और फिर मैंने भी सोचा, वहां चला जाएगा तो उसका भविष्य बन जाएगा।" मैं सोचने लगा "माँ बा अपनी औलाद के लिए क्या कुछ करने को और सहने को तैयार हो जाते हैं। यहाँ तक कि अपने जिगर के टुकड़े को अपने से इतनी दूर भेजने को भी तैयार हो जाते हैं। एक अनजान देश, एक अनजान शहर में जहाँ उसका अपना कोई भी नहीं। क्यों ? अपने बच्चे का सुन्दर भविष्य बनाने के लिए।  

मेरा भाई व्यवसाय करता है और भाभी एक स्कूल में शिक्षिका हैं। उनकी एक बेटी भी है। मैं समझ सकता हूँ कि अपने इकलौते बेटे को अपने से इतनी दूर भेजने का फैंसला इतना आसान नहीं रहा होगा उनके लिए और उनके लिए ही क्यों किसी भी माँ बाप के लिए यह फैंसला बड़ा ही मुश्किल हो सकता है। लकिन अपने बच्चों के सुनहरे भविष्य के लिए वह सब कुछ सहने को तैयार हो जाते हैं। बेटे को बाहर से आने में थोड़ी सी भी अगर देरी हो जाए तो चिंता की लकीरें खिंच जाती हैं माँ बाप के माथे पर  , मगर अब कौन देखेगा, वह कब लौटा ? अगर बच्चे ने खाना ठीक से ना खाया हो तो माता पिता को चिंता हो जाती है, लेकिन अब कौन देखेगा उसने खाना भी ठीक से खाया यां नहीं ? 

यह हमारे परिवार में से दूसरा लड़का था जो कनाडा जा रहा था। इससे पहले मेरी छोटी बहन नीता ने भी अपने इकलौते लड़के स्पर्श को अपने से दूर कनाडा भेजा था, एक साल हो गया है उसको गए हुए। वह भी बहुत ही खुश थी जब उसने हम सबको यह खबर सुनाई थी। मगर मैंने देखे थे उसकी आँखों के वह आंसू, जो उसकी आँखों से बह रहे थे, जब स्पर्श उसे गले लग कर सिक्योरिटी चेकिंग के लिए अंदर चला गया था। ये आंसू इस लिए थे क्यूंकि अब वह नहीं जानती थी कि अपने बेटे को कब देख पाएगी ? एक बहन नहीं जानती थी कि अब वह कब खुद अपने भाई की कलाई पर राखी बाँध पाएगी और एक पिता नहीं जानता था कि अब कब उसका बेटा उसके बराबर अाकर खड़ा होगा ? 

उस समय उनके दिल का दर्द मैं भली भांति महसूस कर रहा था। एक माँ की इच्छा थी कि उसका बेटा फिर एकबार सिक्योरिटी चेकिंग से बाहर आ जाए और वह उसको फिर एक बार जी भर कर देख ले। बहन के आंसू रुक नहीं रहे थे। 

तब मैं उन्हें देख कर यही सोचता रहा था कि यह कितने ही मुश्किल क्षण हैं एक माँ बाप और एक बहन के लिए, उनकी आँखों के आगे से उनका बेटा, भाई ओझल हो गया, पता नहीं कब तक के लिए ? हालाँकि यह निर्णय उनका खुद का था और वह भी क्यों ? अपने बच्चे के सुन्दर भविष्य के लिए उन्होंने अपने दिल को पत्थर कर लिया था। लेकिन पत्थर कभी दिल नहीं हो सकता और दिल कभी पथ्थर नहीं हो सकता , बरस ही पड़ता है। 

आज फिर एक माँ बाप ने वही निर्णय लिया था, अपने बेटे के सुनहरे भविष्य के लिए।  मैं जानता था आज खुश दिखने वाले माँ, बाप, बहन एक समय पर कमज़ोर पड़ जाएंंगे। 
मैं जब शाम को रोहित से जाकर मिला तो वह बहुत ही खुश नज़र आ रहा था। 
"बस दस दिन बाकी हैं कनाडा जाने में।" उसकी आँखों से और उसके बोलने से उसकी ख़ुशी साफ़ झलक रही थी। 
मैंने उसकी पीठ थपथपाते हुए उसे आशीर्वाद दिया मगर दिल भारी था आँखे नाम थीं। 

मैं जानता था यह दस दिन दस घंटों की तरह गुज़र जाएंगे, क्यूंकि उसको और उसके माता पिता को अभी बहुत सी तैयारियां करनी थीं। 
सात दिन यूँही पंख लगाकर उड़ गए। अब केवल तीन दिन बाकी बचे थे, मेरी एक बहन है उसका लड़का सचिन कॉलेज से छुट्टियां लेकर आ गया था, वह रोहित के साथ तीन दिन गुज़ारना चाहता था। मैं जानता था वह भाई तो थे ही मगर उससे भी ज़्यादा अच्छे दोस्त थे। 

जाने के एक दिन पहले तक रोहित अपने कॉलेज के दोस्तों से मिलता रहा। अब उसके चेहरे पर सबसे बिछड़ने का दर्द साफ़ झलकने लगा था, मैं यह जानता हूँ कि कोई भी बच्चा अपने परिवार से अलग होकर नहीं रहना चाहता, सचिन भी मायूस दिखने लगा था। 
कहीं ख़ुशी थी कि उसका एक भाई आ रहा है तो कहीं बिछड़ने का दर्द भी था। 

आखिर वह दिन भी आ ही गया जिसकी तैयारियां न जाने कितने ही दिनों से चल रहीं थीं।आज रोहित घर से बिदा होने वाला था, घर से निकलने से पहले एक बहन शुभ शगुन के तौर पर अपने भाई को भीगी आँखों से दही और चीनी खिला रही थी। एक माँ की आँखों से रह रह कर आंसू छलक जाते थे और एक पिता सभी से छिप छिप कर रो रहा था। रोहित मुंह से कुछ बोल तो नहीं रहा था मगर उसकी आँखे बहुत कुछ बयां कर रहीं थीं, लगा जैसे कहना चाह रहा हो : 

      "मैं कभी बतलाता नहीं, पर अँधेरे से डरता हूँ मैं माँ, 
      यूँ तो मैं दिखलाता नहीं, तेरी परवाह करता हूँ मैं माँ,
      तुझे सब है पता मेरी मां, 
      भीड़ में यूँ ना छोड़ो मुझे, लौट के घर भी आ ना पाऊं माँ  
      भेज ना इतना दूर मुझको तू, याद भी तुझको आना पाऊं माँ,
      क्या इतना बुरा हूँ मैं माँ" 

एयरपोर्ट पहुंच कर फिर वही क्षण मैं देख रहा था, सभी रोहित के साथ एक फोटो खिचवाना चाहते थे, सभी के मोबाइल फोन के कैमरा ओन थे और उस क्षण को कैद कर लेना चाहते थे। रोहित की फ्लाइट की घोषणा हो चुकी थी और अब उसे सिक्योरिटी चेकिंग के लिए अंदर जाना था, फिर एक बेटा, एक भाई , एक भतीजा, एक भांजा और एक दोस्त आँखों से ओझल होने वाला था, पता नहीं कितने महीनों के लिए ? सभी की आँखे नम थीं, सभी उसके चहरे को अपनी आँखों में बसा लेना चाहते थे, सचिन उदास था क्यूंकि एक और भाई उससे बिछड़ रहा था। 
रोहित के चलने से पहले स्पर्श की माँ ने कहा कहा "मेरी तरफ से स्पर्श को ज़ोर से गले लगाना " एक माँ का दर्द और अपने बेटे को गले लगाने की लालसा साफ़ झलक रही थी। बहन ने कहा "स्पर्श को मेरी तरफ से चुटकी भरना " एक बहन का प्यार और अपने भाई के प्रति शरारत साफ़ थी उसमें और हो भी क्यों ना स्पर्श से बिछड़े उन्हें एक वर्ष से भी ज़्यादा का समय हो गया था।  

कुछ ही देर में रोहित अंदर चला गया, जाते जाते उसने आगे पहुँच कर पीछे मुड़ते हुए सभी को हाथ हिला कर बाय कहा, 
लगा जैसे वह कह रहा था


"कल भी सूरज निकलेगा,                                                          
कल भी पंछी गाएंगे, 
सब तुमको नज़र आएंगे 
पर हम ना नज़र आएंगे, 
आँखों में बसा लेना हमको, 
सिने में छुपा लेना हमको
अब हम तो हुए परदेसी "   

और उसका चेहरा पालक झपकते ही आँखों से ओझल हो गया। 

रोहित  के अंदर चले जाने के बाद अब इच्छा थी उस प्लेन की एक झलक पाने की, उसको उड़ता हुआ देखने की, और मैं समझता हूँ उससे भी ज़्यादा फिर एक बार उसे देखने की, क्यूंकि दिल तो अभी भी उसे देखना चाहता था। 

मैं सोचता हूँ यह दिल भी कितना चंचल होता है, जिस माँ बाप ने खुद ही अपने बेटे को इतनी दूर भेजने का फैंसला लिया, उनका दिल तो आज भी चाहता है कि वह उनकी नज़रों के सामने रहे, यह आँखें हमेशां उसे देखती रहें। 

मेरे मन में कई सवाल उठते हैं  :

"तो फिर क्यों एक माँ बाप को इतना कड़ा फैंसला लेना पड़ता है ?" 
"क्यों अपनी आँख के तारे को अपनी ही आँखों से दूर भेजना पड़ता है ?" 
"कब तक हमारे बच्चे हायर स्टडीज़ के लिए विदेशों में जाते रहेंगे ?" "कब तक माँ बाप अपने बच्चों का उज्जवल भविष्य बनाने के लिए उसे विदेश भेजते रहेंगे ?"  
"क्यों हमारे देश में मेहनत के अनुरूप पैसा नहीं दिया जाता ?"  
"कब तक पैसा कमाने की लालसा में बच्चे अपने माँ बाप से दूर होते रहेंगे ?" 
"कब तक इस देश का भविष्य कहे जाने वाले यह नवयुवक खुद का भविष्य बनाने के लिए विदेशों में जाते रहेंगे ?" 
"क्या इसके लिए ज़िम्मेदार हमारा लचर सिस्टम है ?"
"कब तक हमारे हुक्मरान इस बात को समझेंगे ?" 

सवाल कई हैं मगर मैं जानता हूँ इसका हल किसी के पास नहीं और जबतक हमारा देश इन बातों का हल नहीं ढूंढ लेता तबतक माँ बाप अपने बच्चे के सुन्दर भविष्य के लिए उन्हें इसी तरह अपने से दूर विदेशों में भेजते रहेंगे।  

प्लेन आँखों के आगे से गुज़रा और अपने बेटे की एक झलक को तरसती आँखें निराश हो गई। कुछ पलों में प्लेन हवा में उड़ने लगा,लेकिन मैं समझता हूँ यह उड़ान थी न जाने कितने माँ बाप की उम्मीदों की, यह उड़ान थी ना जाने कितनी बहनों की दुआओं की और यह उड़ान थी ना जाने कितने बच्चों के सपनों की। 

Romy Kapoor (Kapildev) 
    


Friday, August 29, 2014

रात के हमसफ़र - A Short Story
















"मामाजी जल्दी करना साढ़े सात बज चुके हैं और आठ बजे की बस है, क्यों कि समय कम है इसलिए थोड़ा तेज़ी से चलिएगा।" मैंने मामाजी से कहा तो वे मुस्कुरा कर बोले "अरे बेटा, घबराओ नहीं, तुम्हारी बस तुम्हें लिए बिना नहीं जायेगी " और उन्होंने अपनी गाडी की गति और थोड़ी बढ़ा दी।

आज मैं अहमदाबाद से मुंबई जा रही थी।  मुझे मुंबई में एक नयी कंपनी में नौकरी मिली थी, कल मुझे नौकरी ज्वाइन करनी थी। वैसे  मैं दिल्ली में रहती हूँ, लेकिन इण्टरव्यू के बाद जब मुझे कॉल लैटर मिला तो समय इतना कम था कि मुझे दिल्ली से मुंबई की सीधी रिजर्वेशन नहीं मिली, तो मैंने सोचा क्यूंना वाया अहमदाबाद ही चली जाऊं, अहमदाबाद में मामाजी भी रहतें हैं एक रात उनके साथ रह लूंगी और फिर अगले दिन शाम को मुंबई के लिए रवाना हो जाऊँगी, इस बहाने सभीसे मिलना भी हो जाएगा। सो मैं कल शाम की गाडी से अहमदाबाद पहुंची थी,पूरी रात सब के साथ बातें करने में गुज़र गई, सुबह वे लोग मुझे अहमदाबाद की सैर करवाने ले गए। गांधी रोड के तीन दरवाज़ा ने मुझे दिल्ली के चांदनी चौक की याद दिला दी, सी जी रोड,रिवर फ्रंट और फिर दोपहर को ऑनेस्ट रेस्टोरेंट की मशहूर पाँवभाजी और दोपहर बाद लॉ गार्डन से मैंने अपने लिए कुछ कपडे ख़रीदे। पूरा दिन बस यूँही गुज़र गया। मैं बहुत ही खुश थी अपने अहमदाबाद होकर मुंबई जाने के फैंसले से। ऐसा नहीं है कि में पहली बार अहमदाबाद आई थी, मगर काफी समय बाद आई थी इसलिए मुझे यह शहर काफी बदला बदला सा लग रहा था। 
"लो बेटा, पहुँच गए।" मामाजी ने कहा तो मैं दिन की यादों में से वापस लौटी। मैने गाड़ी से उतर कर बस के बारे में पूछा तो पता चला कि बस लग चुकी थी और यात्री अपनी अपनी जगह ले चुके थे, बस कुछ ही देर में बस छूटने वाली थी। मैंने मामाजी की गाड़ी से अपना बैग व अटैची उतारे, अटैची को बस की डिक्की में रखवाया और बैग को अपने पास ही रखा, फिर मैं मामाजी के पास गई उनसे गले मिली और कहा "अच्छा मामाजी चलती हूँ, यहां आकर मुझे बहुत ही अच्छा लगा, अब तो मैं मुंबई आ गई हूँ तो आती जाती रहूंगी। "
"ठीक है बेटा, अपना ध्यान रखना और पहुँचते ही फ़ोन ज़रूर करदेना, हम भी समय निकाल कर आएंगे कभी तुम्हारे पास" उन्होंने मेरे सर पर हाथ रखा और और बोले "खुश रहो बेटा" कहते हुए उनकी आँखे नाम हो गईं थीं।

मैं बस में आकर अपनी सीट पर बैठ गई। ज़्यादातर मैं खिड़की वाली सीट ही पसंद करती हूँ, क्यूंकि चाहे ट्रैन हो यां बस मुझे खिड़की से बाहर के नज़ारे देखना अच्छा लगता है।

मेरे साथ वाली सीट अभी खली थी, उसपर कोई भी नहीं आया था।  मैं दिल ही दिल में प्रार्थना कर रही थी कि कोई अच्छा सा पैसेंजर आ जाये,क्यूंकि अगर हमसफ़र अच्छा हो तो सफर अच्छा गुज़र जाता है । बस चलने वाली थी मगर अभीभी कोई आया नहीं था, अब  मैं  सोच रही थी कि काश यह सीट खाली ही जाए और मैं रात भर आराम से सोती हुई जाऊं, सीटिंग के खर्चे में स्लीपर का मज़ा ! 

बस धीरे धीरे चलने लगी थी, एक चौराहा पार करके आगे बढ़ चली थी, आहिस्ता आहिस्ता बस ने अहमदाबाद शहर पार कर लिया था और अब वह अहमदाबाद - वडोदरा एक्सप्रेस हाईवे की तरफ बढ़ रही थी तभी छब्बीस  सत्ताईस वर्षीया एक लड़का, बाल बिखरे हुए, क़द करीब पांच फ़ीट दस इंच के आस पास, रंग गोरा, और दिखने में भी स्मार्ट ही था,मेरी सीट की तरफ ही आ रहा था वह जब तक मेरी सीट तक पहुंचा तबतक मैंने उसका पूरा हुलिया चेक कर लिया था और अंदर से मैं थोड़ी खुश भी थी कि चलो पडोसी तो अच्छा मिला। मेरी सीट के पास आकर उसने हाथ वाला बैग ऊपर रखा, और फिर मेरी तरफ देखता हुआ बोला "ये मेरी सीट है। "
"हाँ तो बैठिये मैंने कब रोका है ?" मैं ऐसे रियेक्ट करने की कोशिश कर रही थी जैसे मैं बहुत ही सख्त किस्म की लड़की हूँ, क्यूंकि मैं अकेली सफ़र कर रही थी, इस लिए मुझे चौकन्नी रहना ज़रूरी था।
"थैंक गॉड" सीट पर बैठते हुए वह धीरे से बोला।
"जी ?"
"मैंने कहा भगवान तेरा लाख लाख शुक्रिया " वह बोला।
मैंने ऐसे जताया जैसे मैंने उसकी बात सुनी ही ना हो, लेकिन उसकी 
बात  का मतलब मैं समझ गई थी और मन ही मन मुस्कुरा रही थी, यह सोच कर कि शायद उसे भी अपना हमसफ़र अच्छा लगा है।  
"क्यूंकि मुझे बस जो मिल गई" वह फिर बोला तो मैंने कुछ इस तरह से मुंह बनाया जैसे उसने कोई कड़वी चीज़ मेरे मुंह में डालदी हो।   
"अगर आपको ऐतराज़ न हो तो मैं आपका यह बैग ऊपर रख दूँ , शायद आपको पाँव रखने में दिक्कत महसूस हो रही है, रास्ता लंबा है इस तरह बैठना मुश्किल होगा।" कहते ही उसने मेरे पाँव के नीचे रखा हुआ बैग खींच कर ऊपर रख दिया और इससे पहले कि मैं कुछ बोलती, उसने कहा "देखिये अब आप कम्फ़र्टेबल महसूस कर रही हैं ना।"
मैंने उसकी बात का कोई उत्तर नहीं दिया और चुपचाप खिड़की से बाहर देखने लगी, लेकिन मैं दिल में सोच रही थी "काफी स्मार्ट बनने की कोशिश कर रहा है "

बस अहमदाबाद-वडोदरा हाईवे पर दौड़ रही थी।
"क्या आप मुंबई जा रही हैं ?" उसने पूछा
"जी हाँ " मैंने बगैर उसकी तरफ देखे ही उत्तर दिया।
"क्या आप अहमदाबाद में ही रहती हैं ?" उसने अगला सवाल दागा।
"नहीं, दिल्ली से आई हूँ, यहां मेरे मामाजी रहते हैं, उनसे मिलने आई थी।"
"मुंबई में भी किसीसे मिलने जा रही हैं ?" उसने अगला सवाल पूछा। 
"जी नहीं वहां जॉब करती हूँ। " 
"क्या आपने यहां के खमण और ढोकला खाए ?" उसने फिर पूछा। 
"नहीं"
"आपको वो तो ज़रूर खाना चाहिए था, किसीने आपसे कहा नहीं ?"
"शायद" उत्तर देने के बाद  मैं खुद झेंप गई, सोचने लगी "मैं उसके हर सवाल का उत्तर क्यों दे रही हूँ ?"
"मैं अहमदाबाद में ही रहता हूँ " मेरे बगैर पूछे ही उसने कहा।
"अब हम अहमदाबाद-वडोदरा एक्स्प्रेस हाईवे पर हैं, हालांकि बीचमें नाडियाड, आनंद और वडोदरा आएगा लेकिन यह बस वडोदरा बाय पास से सीधी  भरुच की तरफ निकल जायेगी। "
जैसे ही उसको पता चला, मैं दिल्ली से आई हूँ, वह एक गाइड की भूमिका में आ चूका था। मैं चुप थी।
तभी वह उठा बैग में से एक पैकेट निकालते हुए, मेरी तरफ़ बढ़ाया और  पूछा "लीजिये कुछ खायेंगी आप ?"
"जी नहीं शुक्रिया"

वह करीब दस मिनट तक खाता रहा। मुझे उसके खाने के तरीके से बड़ी कोफ़्त हो रही थी, मगर वह खाता रहा, मैं कुछ कहना चाहते हुए भी चुप रही।
"दरअसल चलते समय कुछ खाया नहीं था " खाने के बाद वह बोला।
तभी वह बाहर देखता हुआ बोला "हम लोग नडियाद से गुज़र रहे हैं, यहां के पापड और मठिये काफी मशहूर हैं। "
मैं सोच रही थी "क्या लड़का है, इतना खाने के बाद भी इसे खाने की चीज़ें ही याद आ रहीं हैं !"
वह बीच बीच में खिड़की से बाहर देखने के बहाने मुझे देख लेता था, और जब भी बस किसी शहर से होती हुई गुज़रती तो तुरंत ही गाइड की भूमिका में आ जाता  था। आनंद से जब बस गुज़र रही थी तो बोला "यह हम लोग आनंद बायपास से गुज़र रहे हैं, यहाँ की अमूल डेरी के बारे में तो आपने सुना ही होगा। इनके पिज़्ज़ा आजकल काफी मशहूर हो रहे हैं। लेकिन मुझे इनकी चॉकलेट बड़ी अच्छी लगती हैं, आई रियली लव चॉकलेट।  "
एक बार तो मेरे दिल में आया उससे कहदूं कि मुझे गाइड की कोई ज़रूरत नहीं है, और नाही मुझे खाने का इतना शौक है, मगर मैं चुप रही।
बस जब वडोदरा से होकर गुज़र रही थी तो बोला "यहां का लीला चिवड़ा बहुत ही प्रसिद्द है, थोड़ा गिला होता है मगर खाने में बड़ा ही टेस्टी लगता है। "
मुझे उसकी बातों पर गुस्सा भी आ रहा था, और दिल ही दिल में सोचती भी रही "इसके पास खाने की चीज़ों के इलावा करने को और कोई बात ही नहीं है?"
वडोदरा क्रॉस करके बस भरुच हाईवे पर किसी रेस्तरां पर रुकी तो उसने उठते हुए मुझसे पूछा "आप कुछ खायेंगी ?"
"जी नहीं शुक्रिया " मैंने झल्लाते हुए उससे कहा।
"अच्छा तो चाय तो पियेंगी ही ?" मेरा उत्तर सुननेसे पहले ही वह आगे बढ़ गया।
सामने रेस्तरां से उसने पहले एक चाय ली और मुझे दे गया और फिर अपने लिए शायद एक वेफर का और शायद एक बिस्किट पैकेट और एक चाय खरीदी और वहीँ सामने खड़ा होकर खाने लगा। मैं चाय की चुस्कियां लेते हुए उसे देख रही थी, दिखने में बुरा नहीं लग रहा था, ब्लू जीन्स के ऊपर हलके नीले रंग की शर्ट पहन रखी थी,पांव में स्पोर्ट्स शूज पहन रखे थे, उसे देख कर लगता था ड्रेस सेंस अच्छा था उसमें। मैं यूँही खोई हुई उसे देख रही थी तभी उसने अचानक मेरी तरफ देखा तो झेंपते हुए मैंने अपनी नज़रें दूसरी तरफ फेर लीं।  शायद उसने मेरी इस हरकत को भांप लिया था, इसीलिए वह मुझे देख कर मुस्कुरा रहा था। मैं दिल ही दिल में शर्म महसूस कर रही थी "क्यों मैं उसे इस तरह देख रही थी, वह क्या सोचता होगा मेरे बारे में ?" 

बस में वापस आकर बैठते हुए उसने पूछा "चाय कैसी लगी ? इस रेस्तरां की चाय बड़ी अच्छी होती है, मैं तो जब भी आता हूँ यहां की चाय ज़रूर पीता हूँ।" फिर कुछ रूककर बोला "अब भरुच आएगा, यहां के सिंग दाने बड़े ही मशहूर हैं "
"आप जब भी आते होंगे वहाँ के सिंग दाने भी ज़रूर लेजाते होंगे ?" मैंने आँखें निकालते हुए उससे पूछा।
"एग्ज़ॅक्ट्ली ! ये बड़े बड़े दाने, बिलकुल आप की आँखों के जैसे। "
"ए मिस्टर " मैंने गुस्से वाले अंदाज़ में कहा। वह मुस्कुरा कर चुप हो गया, और मैं खिड़की से बाहर देखने लगी। मगर मैं अंदर ही अंदर मुस्कुरा रही थी, यह सोच कर कि उसने मेरी बड़ी बड़ी आँखों की तारीफ़ की थी। मुझे लगा शायद जबसे बस में आकर बैठा था तबसे पहली कोई  काम  की बात उसने की थी। 

मैं खिड़की से बाहर देख रही थी, आँखों के आगे से तेज़ी से गुज़रते नज़ारे मुझे अच्छे लग रहे थे  बाहर से आ रही ठंडी हवा मेरे बालों को उड़ा रही थी जिस वजह से मैंने अपने सर को चुन्नी से ढक लिया, मैंने महसूस किया वह बाहर देखने के बहाने मुझे देख रहा था। उसके इस तरह देखने से मुझे शर्म सी महसूस हो रही थी, मैंने नज़रें घुमा कर जब उसकी तरफ देखा तो वह बोला "कितनी खूबसूरती है। "
"जी ?"
"मेरा मतलब कितनी खूबसूरती है,नज़रें ही नहीं हटतीं" वह तुरंत ही बाहर देखता हुआ बोला।  
मैं उसके कहने का मतलब समझ रही थी इसलिए चुप रही, वह काफी देर तक इसी तरह देखता रहा। तभी बाहर की रौशनी देख कर वह बोला "शायद सूरत आ गया है, यहां की घारी बहुत ही मशहूर है, काफी घी में बनाई जाती है, इसलिए गरम करके खाने से बहुत अच्छी लगती है।" वह फिर घूम फिर कर वही खाने की बात पर आ चुका था, मैंने गुस्से से आँखें बंद करलीं और यह जताने की कोशिश करने लगी कि अब मुझे बड़ी नींद आ रही है।  
"वैसे मैं आपसे यह पूछना तो भूल ही गया कि दिल्ली में भी तो खाने की कोई चीज़ प्रसिद्द होगी ?"
"हाँ है ना " मैंने तुरंत अपनी आँखें खोलते हुए कहा।
"क्या ?"
"सैंडल " मैं तपाक से बोली।
"तब तो आप रोज़ खाती होंगी ?" उसके इस उत्तर से मैं सकपका कर रह गई और गुस्से से फिर अपनी आँखें मूंद लीं। 

करीब पंद्रह बीस मिनट बाद वह सो गया, सोते सोते उसका सर लुढक कर  मेरे कंधे  पर आ गया था और जनाब बड़े ही आराम से मेरे कंधे पर सर रख कर सो रहे थे, मुझे गुस्सा आ रहा था। मैंने पहले तो हाथ से उसका सर हटाना चाहा,मगर फिर कुछ सोच कर रुक गई और थोड़ा सा आगे की तरफ झुक गई तांकि खुद ही उसकी नींद खुल जाए, मगर मेरे आगे होते ही उसका सर लुढक कर मेरी पीठ पर आ गिरा। मैं परेशान थी, मैंने उसके सर को पीछे की तरफ धक्का मार कर दबाने की कोशिश की मग़र वह ढीठ सोता ही रहा, तंग आ कर मैंने उसे ज़ोर से झिंझोड़ा तो अपनी नींद से उठता हुआ बोला "सॉरी, आँख लग गई।" उसके बोलने के अंदाज़ से मुझे उसपर तरस आया, मगर मैं उसे ऐसे कैसे सोने दे सकती थी। 

अब मुझे भी नींद आने लगी थी और नींद में मेरा भी सर पता नहीं कब लुढक कर उसके कंधे पर गिर जाता, जब अचानक मेरी नींद खुलती तो मैं झेंप कर सीधी हो जाती। नींद के इन्हीं झोंकों में पता ही नहीं चला कब मुंबई आ गया, जब शोर गुल से मेरी आँख खुली तो मैंने पाया कि उसका सर और मेरा सर मिले हुए थे, मैं तुरंत सीधी हो कर बैठ गई।  वह भी उठ गया था, उसने खिड़की से बाहर झांकते हुए कहा "मुंबई आ गया, यहां के वड़ा पाँव ज़रूर खाइएगा बड़े ही टेस्टी होते हैं।"

मैं उसे गुस्से से देख रही थी और सोच रही थी "जाते जाते भी खाने की ही टिप दे रहा है। "
खैर, मुझे जल्दी थी, तैयार हो कर मुझे ऑफिस पहुंचना था, इसलिए बस से उतर कर मैं ऑटो पकड़  कर तुरंत ही निकल गई।  

मैंने ऑफिस के रिसेप्शन पर पहुँच कर अपना लैटर दिखाया तो मुझे कुछ देर वहीँ इंतज़ारवही करने को कहा गया, मैं सोफे पर बैठी ही थी कि तभी सामने के मुख्या द्वार से वही रात वाला लड़का अंदर दाखिल हुआ।हमारी नज़रें मिलीं और उसे देखते ही मैं ज़ोर से चिल्लाई "वड़ा पाँव ?" और मैं धप्प से वहीँ सोफे पर बैठ गई। 

Romy Kapoor (Kapildev)

Wednesday, August 20, 2014

गुनहगार - A Short Story


"अरे अनु, अभी तक तैयार नहीं हुईं तुम ? देखो, साढ़ेनौ बज गए हैं    और पौने दस बजे का शो है !" आकाश ने ज़ोर से आवाज़ लगाते हुए अनु से कहा तो अंदर से अनु की आवाज़ आई "आई, बस दो मिनट" .

आकाश और अनु की शादी की पांचवीं सालगिरह थी आज, इसी को सेलिब्रेट करने के लिए दोनों आज रात के शो में फिल्म देखने जा रहे थे। शादी को पांच साल हो गए थे मगर दोनों के यहाँ कोई संतान नहीं हुई थी। कितनी ही जगह मन्नते मान चुके थे, जहाँ कोई कहता चले जाते, जैसे कोई कहता उपाय करते, मगर कोई फायदा नहीं हुआ था।

अनु जब तैयार होने में काफ़ी देर लगा रही थी तो आकाश उठ कर दूसरे कमरे में गया और अनु को देख कर बोला "हम रात के शो में फिल्म देखने जा रहे हैं दिन के शो में नहीं जो इतनी सजधज रही हो, रात में तुम्हें कोई नहीं देखेगा। "
"कैसी बातें करते हो ? मैं क्या लोगों के लिए तैयार होती हूँ ?" अनु ने नाराज़गी जताते हुए कहा और साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए आकाश के पास आकर खड़ी होते हुए ऐसे देखने लगी जैसे आकश से कुछ पूछ रही हो।
"अरे बाबा बहुत ही सुन्दर लग रही हो, अब जल्दी चलो आधी फिल्म देखनी है क्या ?"
दोनों ही तेज़ी से बहार की और बढ़ गए, ताला अनु के हाथ में थमाते हुए आकाश ने कहा "तुम ठीक से लॉक लगाओ तबतक मैं गाडी निकालता हूँ" कहते हुए आकाश आगे बढ़ गया।
"चलो अनु जल्दी करो " गाड़ी को अनु के पास लाते हुए आकाश  ने कहा।  
अनु के गाड़ी में बैठते ही आकाश ने गाडी को आगे बढ़ा दिया, गली का मोड़ काट कर गाड़ी को मैन सड़क पर घुमाते हुए हुए आकाश ने अपनी घड़ी की तरफ देखते हुए कहा "अनु बहुत लेट कर दिया तुमने, यहाँ से करीब बीस किलोमीटर की दूरी पर है सिनेमा हॉल, पहुँचते पहुँचते तो लगता है फिल्म शुरू भी हो जाएगी, लोग कहते हैं कि अगर शुरू से फिल्म नहीं देखि तो कहानी समझ में ही नहीं आएगी।"
अनु चुप थी, वह कार से बहार देखते हुए कुछ देर बाद दबी सी आवाज़ में बोली "आकाश कितना सूना रास्ता है, हमारी कार के इलावा और कोई वाहन दूर दूर तक नज़र नहीं आ रहा, ऐसे में तुम रात के शो की टिकट ले आये, मुझे तो बहुत डर लग रहा है। "
"अरे डरो नहीं मैं हूँ न तुम्हारे साथ, और फिर फिल्म देखने का मज़ा तो रात के शो में ही आता है।" आकाश ने अनु की आवाज़ में छिपे डर को भांपते हुए कहा और अपनी गाड़ी को बाईं तरफ मोड़ दिया। गाड़ी सरपट सड़क पर दौड़ी चली जा रही थी, तभी अनु ने पूछा 
"अभी कितना दूर है ?"
"बस वह सामने रौशनी दिख रही है ना, वही है " आकाश ने उत्तर दिया। 

गाड़ी को पार्क करके दोनों ही तेज़ी से सिनेमा हॉल में चले गए, फिल्म शुरू हो चुकी थी, अपनी सीट पर बैठते हुए आकाश ने अनु की तरफ देखते हुए कहा "देखाना ! करीब पंद्रह मिनट की फिल्म निकल चुकी है।"
लेकिन अनु चुप थी, किसी गुनहगार की तरह। 
फिल्म के बीच बीच में आकाश कभी कभी रोमांटिक होता हुआ कुछ बचकानी हरकत कर देता था, मगर जब अनु उसका हाथ झटक कर आँखें निकाल कर देखती तो वह एक आज्ञाकारी बालक की तरह बैठ जाता था।

फिल्म करीब पौने एक बजे खत्म हुई, हॉल से बाहर निकलते हुए आकाश ने अनु से कहा "देखाना, मैंने तुमसे कहा था न कि फिल्म अगर शुरू से नहीं देखी तो कहानी समझ में ही नहीं आएगी ? मुझे तो लगता है फिल्म एक बार फिर देखनी पड़ेगी "
"हां हां देखलेना मगर अभी तो यहां से जल्दी से निकलने की करो, ये सब गाड़ियां निकल रहीं हैं तो हम भी इन्हीं के साथ ही निकल चलें।" अनु ने कहा
कई गाड़ियां निकल रहीं थीं, आकाश भी उन्हीं गाड़ियों के साथ अपनी स्पीड बनाये हुए था, अभी करीब पांच छे किलोमीटर ही आगे आये थे की आकाश की गाडी अचानक डगमगाने लगी। डर के मारे अनु ने आकाश की तरफ देखा, तबतक आकाश ब्रेक मारके गाडी को कंट्रोल कर चूका था, गाडी को बंद करके नीचे उतर कर उसने टायर चैक किये और अनु के पास आकर बोला "टायर पंक्चर हो गया है, तुम यहीं  गाडी में ही बैठो मैं अभी व्हील बदल देता हूँ, करीब पंद्रह बीस मिनट लगेंगे "
"तब तक तो सारी गाड़ियां निकल जाएंगी ?" अनु ने घबराई सी आवाज़ में पूछा।
"तुम घबराओ नहीं बस थोड़ी देर लगेगी " कहता हुआ आकाश अपने काम में लग गया।

अनु का दिल ज़ोरों से धड़क रहा था, उसने देखा धीरे धीरे उनके साथ वाली सभी गाड़ियां निकल चुकीं थीं, अब इस सुनसान सड़क पर बस अँधेरा था और उनकी गाडी थी। अँधेरा होने की वज़ह से आकाश को भी दिक्कत आ रही थी। सड़क पर गहरा सन्नाटा था, तभी अनु ने देखा सामने से कोई कार चली आ रही है, कार की गति कुछ दुरी पर ही कम हो गयी व कुछ ही पलों में वह कार उनकी कार की बराबरी पर आकर खड़ी हो गयी। अनु ने नज़रें घुमा कर देखा, ड्राइविंग सीट पर करीब ३५ वर्षीय युवक बैठा हुआ था, उसकी बगल में भी उसीका हमउम्र व्यक्ति था , पीछे की सीट पर भी दो व्यक्ति बैठे हुए थे मगर अनु ने उनकी तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। तभी आगे बैठे युवक ने अनु की तरफ देखते हुए पूछा "क्या हम आपकी कोई मदद कर सकते हैं।" 
अनु की साँसे तेज़ चलने लगीं, उसने उनकी बात के जवाब में अपना मुंह फेर लिया।

कुछ देर वह लोग कार में बैठे कुछ खुसुर फुसुर करते रहे, फिर वे चारों ही कार में से बहार आये और उनमें से एक अनु वाली साइड पर आकर खड़ा हो गया, दूसरा कार की  दूसरी साइड पर खड़ा हो गया, और वह दोनों में से एक कार के आगे और एक आकाश के पास जाकर बोला "क्या हम आपकी कुछ मदद कर सकते हैं ?" आकाश ने नज़रें उठा कर उस व्यक्ति की तरफ देखा और बोला नहीं बस अब सिर्फ नटे ही टाइट करनी हैं, शुक्रिया। "
"तो फिर आप हमारी मदद कर दीजिये " वह फिर बोला
"हां हां बोलिए ?" आकाश ने वहीँ बैठे हुए ही पूछा।
"आपकी बीवी बड़ी खूबसूरत है......" कहते हुए उसने आकाश को गर्दन से दबोच लिया। तबतक कार की अगलबगल खड़े दो युवक कार में समा चुके थे, अनु ने चीखने की कोशिश की मगर उनमे से एक ने अनु का मुह बंद कर दिया। आकाश उन दोनों के चंगुल से छूटने की बेतहाशा कोशिश कर रहा था, उसने चिल्लाने की भी कोशिश की मगर वह कामयाब नहीं हो सका, और फिर दरिंदगी का वह खेल आकाश की आँखों के सामने चलता रहा, उसने शर्म के मारे अपनी नज़रें झुकाली, अनु छटपटाती रही, चिल्लाने की कोशिश करती रही मगर कोई फायदा नहीं हुआ, पंछी फड़फड़ा रहा था और दरिंदे अपना खेल खेल रहे थे। पूरा एक घंटा चला वह दरिंदगी का खेल और उसके बाद चारों ही अपनी कार में फरार हो गए। 
आकश किसी तरह व्हील की नटे कस कर कार का दरवाज़ा खोल कर ड्राइविंग सीट पर आकर बैठ गया, उसने नज़रें घुमा कर पीछे की सीट पर देखा तो पाया अनु अपनी साड़ी से अपने बदन को ढकने की कोशिश कर रही थी, उसके बाल बिखरे हुए थे, और उसकी आँखों में आंसू थे, दोनों की नज़रें मिलीं और दोनों ही की नज़रें शर्म के मारे झुक गईं, मगर ना तो आकाश अनु के पास गया ना ही उसने उसके आंसू पोंछे।  

घर पहुँच कर अनु अपने कमरे में चली गई, और आकाश वहीँ लिविंग रूम में ही सोफे पर धप्प से बैठ गया। 
अनु अपने कपड़े बदल कर वहीँ बिस्तर पर बैठ गई, उसकी आँखों से आंसू बह रहे थे, वह दहाड़ें  मार कर रोना चाहती थी, तभी आकाश ने कमरे में प्रवेश किया और अनु की तरफ नज़रें कर के धीरे से बोला 
"मैं पुलिस स्टेशन फोन लगा रहा हूँ, तुम्हे बात करनी होगी " .
"नहीं पुलिस स्टेशन फोन मत लगाना, पुलिस को इन्फॉर्म करने से क्या होगा ? वह लोग तो अबतक कहीं के कहीं पहुँच चुके होंगे, पुलिस मुझसे तरह तरह के सवाल पूछेगी 'रेप कितने लोगों ने किया ? कैसे किया ? रपे करते समय तुम्हारे कपड़े........कुछ देर रुकने के बाद अनु फिर बोली "मामला उछलेगा, प्रेस वाले आएंगे, न्यूज़ चैनल वाले आएंगे और सभी अपने अपने तरीके से सवाल पूछेंगे, अड़ोस पड़ोस ,मोहल्ले वाले, यहां तक कि सारा शहर जान जाएगा, तुम और मैं किस किस को जवाब देते फिरेंगे ? क्या मैं मोहल्ले में यां बाजार में निकल पाऊँगी ? सभी की नज़रें मुझ पर गढ़ी होंगी, सभी मुझसे कोई ना कोई सवाल करना चाहेंगे, किस किस को जवाब देती रहूंगी ? क्या तुम अपने ऑफिस में लोगों के चुभने वाले सवालों का जवाब दे पाओगे ?"
"मगर इस तरह हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना भी तो बुझदिली होगी" आकाश ने कहा
"प्लीज, मैं आपके आगे हाथ जोड़ती हूँ, मैं ज़िन्दगी के उस दौर से गुज़री हूँ जहां हर औरत सिर्फ और सिर्फ मौत ही चाहेगी। जिस औरत की इज़्ज़त उसीके पति के सामने लूटी गई हो और ………।  "कहतेकहते  वह फूट फूट कर रोने लगी, यूँ ही रोते रोते बोली "मुझे और ज़लील मत कीजिये कि मैं अपना अस्तित्व ही भूल जाऊं।"
आकाश चुप हो गया, वह असमंजस में था मगर फिर उसने भी सोचा कि 'दुनिया का सामना करना उसके लिए तो मुश्किल होगा ही मगर अनु के लिए तो और भी ज़्यादा मुश्किल हो जाएगा।'

रात दोनों की ही बड़ी मुश्किल से गुज़री, दोनों ही सारी रात करवटें बदलते रहे, रह रह कर अनु की सिसकियों की आवाज़ें आकाश के कानों में पड़ रहीं थीं मगर ना तो आकाश ने अनु की तरफ देखा और ना ही अनु आकाश से नज़रें मिला पाई।

सुबह उठ कर आकाश अपने ऑफिस के लिए तैयार हो रहा था, मगर दोनों ही एक दूसरे से कतराते रहे,एक दूसरे का सामना करने से बचते रहे। नाश्ते की टेबल पर आकाश आकर बैठा तब भी अनु दुसरे कमरे में ही बैठी रही, आकाश भी नाश्ते की टेबल पर आकर बैठा ज़रूर मगर नाश्ता किये बिना ही ऑफिस चला गया। 
ऑफिस में भी पूरा दिन आकाश आज गुमसुम सा बैठा रहा, उसका किसी भी काम में मन नहीं लग रहा था, रह रह कर रात की सारी घटना और उन चारों के चेहरे उसकी आँखों के सामने घूमते रहे और कार के अंदर की वो आवाज़ें आकाश के कानों से टकरा कर उसे विचलित कर रहीं थीं, गुस्से के मारे रह रह कर उसकी मुट्ठियाँ भींच जातीं थीं। 

वैसे आकाश जब भी ऑफिस में होता था तो अनु  दिन  में दो तीन बार उसे फोन कर लेती  थी, यां आकाश भी फुर्सत के समय अनु से फोन पर बात कर लेता था, मगर आज दोनों ही खामोश  थे।

शाम को ऑफिस  से  निकल  कर आकाश  यु ही सडकों पर घूमता रहा, घर जाने का मन  नहीं  कर  रहा  था उसका। रात करीब साढ़े नौ बजे जब आकाश घर पहुंचा तो दरवाज़ा अनु ने ही खोला, वह दरवाज़े पर नज़रें झुकाये खड़ी थी, राकेश भी अपनी नज़रें दूसरी तरफ घुमाता हुआ सीधा अंदर चला गया। अनमने ढंग से खाना खा कर दोनों ही रात को बिना कोई बातचीत किये ही सो गए।

दिन गुज़रते रहे अनु जब भी आकाश से कोई बात करने की कोशिश करती तो वह बिना उसकी तरफ देखे ही उत्तर दे देता था। दिन अब इसी तरह तन्हां तन्हां से गुज़र रहे थे और रातें बिलकुल खामोश। 
अनु का कोई भी कुसूर ना होने के बावजूद वह अपने आप को गुनहगार समझने लगी थी, वह अपने पति के रवैये से काफी परेशान थी, हादसे की इस घड़ी में उसे आकाश के प्यार, स्नेह और सहानुभूति की ज़रूरत थी, लेकिन आकाश था कि उसके  सामने देखता तक नहीं था, प्यार तो दूर की बात थी, उस दिन के बाद आकाश ने उससे ठीक से बात भी नहीं की थी। वह जानती थी कि आकाश रात को ठीक से सो नहीं पाता, वह ठीक से खाना भी नहीं खाता था। वह सब कुछ सह सकती थी मगर आकाश को इस तरह रोज़ रोज़ मरता नहीं देख सकती थी।

रात का समय था। दोनों ही बिस्तर पर लेटे हुए थे। अनु ने घूम कर देखा आकाश की पीठ थी अनु की तरफ,तभी अनु हलके से उठी, खिड़की से छन कर आ रही चांदनी की रौशनी में उसने देखा आकाश शायद सो गया था।  वह चुपके से उठी और दुसरे कमरे में गई, उसने कागज़ के ऊपर कुछ नोट्स लिखे और कागज़ को वहीँ पेपरवेट के निचे दबा कर रख दिया और बैग में अपने कपड़े रख कर कुछ लेने के लिए जैसे ही मुड़ी तो उसने आकाश को अपना लिखा वह कागज़ अपने हाथों में लिए खड़ा पाया।
"ये क्या है ? "
"मैं तुम्हें छोड़ कर जा रही हूँ "
"क्यों ?"
"मैं तुम्हें इस  तरह रोज़ रोज़ घुट घुट कर मरते नहीं देख सकती "
"मगर मैंने तो कुछ भी नहीं कहा "
"यही तो दिक्कत है कि तुमने कुछ कहा नहीं, मगर तुम्हारी ख़ामोशी बहुत कुछ बयां कर रही है। तुम्हें मुझसे शिकायत है ना, मगर मुझे यह तो बतादो कि मेरा कुसूर क्या था ?" अनु ने कहा
"मुझे शिकायत तुमसे नहीं अपने आप से है, मैं ही तुम्हारी रक्षा नहीं कर पाया "
"मगर तुम्हें पता है ऐसी घडी में जब मुझे सबसे ज़्यादा तुम्हारी ज़रूरत थी , तुम्ही नहीं थे मेरे पास ?" अनु कहते कहते फ़ूट फ़ूट कर रोने लगी।
"मुझे माफ़ करदो अनु, मैं अपने ही जज़्बातों के साथ जीता रहा इस वज़ह से मेरा ध्यान ही नहीं गया तुम्हारी तरफ। तुम्हारा दर्द मैंने महसूस ही नहीं किया, मैंने सोचा ही नहीं तुमने क्या सहा ? तुमने क्या खोया है ? अनु,हम मर्द भी कितने खुदगर्ज़ होते हैं,पत्नी के साथ बलात्कार हो जाए तो हम पत्नी को ही छोड़ने को तैयार हो जाते हैं , मगर उस औरत  के बारे में कभी नहीं सोचते जिसे उस पीड़ा से गुज़रना पड़ा, मैं भी सिर्फ अपने बारे में ही सोचता रहा, क्यूंकि मैं भी तो एक आम मर्द ही हूँ, तुम्हारा तो ख़्याल भी नहीं आया मेरे दिल में,मैं तो सिर्फ यही सोचता रहा कि अब तुम मेरे लायक नहीं रह गई हो,मैंने कभी सोचा ही नहीं कया कुसूर था तुम्हारा? मैंने कभी सोचा ही नहीं कि तुम्हें कितनी पीड़ा सहनी पड़ी उस रात, कितना मुश्किल होता होगा किसी भी औरत के लिए इतने बड़े हादसे को झेल पाना और तुम्हारे दर्द की उस घड़ी  में मैंने ही तुम्हारा साथ नहीं दिया, क्यूंकि मेरी सोच भी तो एक आम मर्द जैसी ही है,अनु,हम मर्द कितना भी पढ़ लिख जाएँ, मगर सोच ? सोच तो वही रहेगी, दकियानूसी।अनु,असल में तो मैं हूँ तुम्हारा असली गुनहगार, मुझे माफ़ करदो अनु, मुझे माफ़ करदो । "

अनु आकाश के सीने से लगकर सिसक सिसक कर रोने लगी और आकाश हौले हौले से उसके सर पर हाथ फेरता रहा, अनु को लग रहा था जैसे उसकी भंवर में डोल रही कश्ती को माझी ने संभाल लिया हो। 

Romy Kapoor (Kapildev)

Saturday, August 9, 2014

दिलों के रिश्ते - A Short Story





सुबह का समय था, गैस का चूल्हा जल रहा था और उसके ऊपर सरिता ने दूध उबलने के लिए रखा हुआ था। सरिता ने दूध का पतीला गैस के ऊपर चढ़ाया ही था कि पड़ोसिन के बुलाने पर वह बाहर चली गई थी, उसीसे बातें करते हुए उसे ध्यान ही नहीं रहा कि दूध ऊपर रखा हुआ है। उसका पति राकेश नहाने गया हुआ था, जब राकेश नहा कर निकला तो उसने देखा दूध उफ़न कर बाहर गिर रहा था,जिसकी वजह से पूरे शेल्फ पर दूध ही दूध फ़ैल गया था, गैस के बर्नर पर दूध गिरने की वजह से गैस बुझ चुका था, मगर कॉक ओन होने की वजह से गैस लीक हो रहा था। जब राकेश ने यह देखा तो तुरंत भाग कर पहले गैस का स्विच ऑफ किया और गुस्से में लाल पिला होते हुए ज़ोर से चिल्लाते हुए अपनी पत्नी को आवाज़ दी "सरिता"
सरिता ने जब गुस्से में तमतमाती हुई आवाज़ सुनी तो वह तुरंत अंदर की तरफ  भागी।
"ये देख रही हो ? तुम्हारा ध्यान किसी भी काम में ठीक से लगता है कि नहीं ?" राकेश ने चिल्ला कर कहा।
"अरे वो पड़ोसिन ने आवाज़ दी तो मैं बहार चली गई और बातों बातों में ध्यान ही नहीं रहा, इसमें इतना चिल्लाने वाली क्या बात हो गई ?" सरिता बोली
"चिल्लाने वाली कोई बात ही नहीं ! एक तो पूरा दूध गिर गया, गैस चालू था अगर मैं घर में नहीं होता यां मेरा भी ध्यान नहीं गया होता तो कोई भी एक्सीडेंट हो सकता था, और तुम कह रही हो कि चिल्ला क्यों रहे हो ?" राकेश काफी गुस्से में था।
सरिता यह समझ रही थी कि उससे गलती हुई है, सो वह चुप चाप एक कपडे से शेल्फ को साफ़ करने लगी।

राकेश और सरिता के झगड़े कोई नयी बात नहीं थी, आये दिन उनमें झगडे होते रहते थे कई बार तो किसी बात को लेकर झगड़ा इतना बढ़ जाता था कि दोनों के चिल्लाने की आवाज़ें अड़ोस पड़ोस के लोग भी सुनते थे, और ये बात अब सभी जानते थे कि उन दोनों के रिश्ते आपस में ठीक नहीं हैं। कभी भी, किसी भी, छोटी सी बात पर दोनों लड़ने झगड़ने लगते थे।

दोनों के इन रोज़ रोज़ के झगड़ों से तंग आकर उन्होंने कोर्ट में तलाक़ की अर्ज़ी दे रखी थी, मगर कोर्ट ने उन्हें छः महीने का समय दिया था, अपने बीच के  मनमुटाव को दूर करने का व अपने रिश्तों को सुधारने का।
दो महीने का समय गुज़र चुका था और अब सिर्फ चार महीने बाकी थे, मगर ना तो इन दोनों में कोई बदलाव आया था और नाही उनके रोज़ रोज़ के झगड़े कम हुए।

दोनों की एक बेटी भी थी, तृषा नाम था उसका, अभी तीसरी कक्षा में पढ़ती थी वह। जब भी उसके सामने उसके माता पिता का झगड़ा होता तो वह सहम जाती थी और चुप चाप आंसू बहाती रहती थी, मगर घंटो दोनों में से किसी का ध्यान नहीं जाता था उसकी तरफ। घंटो वह अकेली बैठी रहती थी और कभी कभी तो यूँही रोते रोते बिना कुछ खाए पिए ऐसे भूखी ही सो जाती थी।

दोनों के दिन यूंही गुज़र रहे थे। दोपहर का समय था तृषा भी स्कूल से लौट चुकी थी। राकेश दोपहर का खाना खाने के लिए घर आया था, तभी उसने महसूस किया कि सरिता अभी अभी कहीं बाहर से आई थी।
"कहीं बहार गयीं थीं ?" राकेश ने सरिता की तरफ देखते हुए पूछा।
"हाँ, अपनी एक सहेली से मिलने गई थी" सरिता ने उत्तर दिया।
"तुमने मुझे बताया नहीं ? "
"मैंने ज़रूरी नहीं समझा " सरिता  ने उत्तर दिया तो राकेश की भवें चढ़ गईं।
"क्यों" उसने पूछा
"क्यूंकि ज़्यादा दूर नहीं गई थी ". सरिता ने कहा।
"सवाल पास यां दूर का नहीं है, तुम्हें मुझे पूछना चाहिए था यां मुझे बताना चाहिए था, तुम कहाँ गई हो इसका मुझे पता होना चाहिए, पति हूँ मै तुम्हारा " राकेश ने कहा तो सरिता ने आँखें घुमा कर राकेश की तरफ देखते हुए कहा "कितने महीने के ?"
"चाहे दो दिन ही क्यों ना बाकी रह गए हों, जब तक तुम इस घर में हो तब तक तुम्हें एक पत्नी की तरह ही रहना होगा" राकेश ने कहा।
"और उसके बाद ?" सरिता ने आँखे चौड़ी करते हुए पूछा
"उसके बाद तुम कहाँ जाती हो, क्या करती हो मुझे उससे कोई मतलब नहीं रहेगा" राकेश ने उत्तर दिया।
"तो फिर अभिसे इस चीज़ की आदत डालनी शुरू करलो "
"देखो सरिता, तुम बहस कर रही हो" राकेश ने कहा।
"मैं बहस नहीं कर रही, मैं आने वाली परिस्थितियों से तुम्हे अवगत करवा रही हूँ " सरिता ने थोड़ी ऊंची आवाज़ में जवाब दिया।
"देखो सरिता हमेँ कोर्ट ने एक समय दिया है और उस समय मर्यादा के दौरान हमें एक दूसरे के साथ घर के तौर तरीकों के हिसाब से ही रहना होगा " राकेश बोला।
"घबराओ  नहीं भाग नहीं जाउंगी किसीके साथ, ऐसी औरत नहीं हूँ "
दोनों में काफी देर बहस होती रही और बीच बीच में यह बहस उग्र भी हो जाती।  मगर आखिर में राकेश यह कहता हुआ कि "तुमसे तो बहस करना ही बेकार है " अपना बैग उठा कर बिना खाना खाए ही वापस अपने ऑफिस लौट गया। सरिता ने अपनी दवाई खाई और अंदर बैडरूम में जाकर सो गई।

इन सब के बीच एक छोटी सी बच्ची थी, तृषा, जो उसी समय स्कूल से वापस लौटी ही थी, उसने खाना भी नहीं खाया था।  डरी सहमी सी तृषा दूसरे कमरे में बैठी थी, चेहरे पर डर और आँखों में आंसू, मगर दोनों मेंसे किसीने उसकी सुध भी नहीं ली थी। दोनों सिर्फ अपने सुख चैन के लिए अलग होना चाहते थे मगर तृषा का क्या होगा दोनों  मेंसे किसीने नहीं सोचा था। छोटी सी बच्ची मजबूर थी, वह कुछ कर भी नहीं सकती थी।

युहीं कुछ देर वह बुत बनी खड़ी रही फिर कुछ देर बाद वह भी चुपचाप बैडरूम में जाकर अपनी मम्मी के पास जा कर लेट गई। करीब एक घंटे बाद जब राकेश का गुस्सा ठंडा हुआ तो अचानक उसे याद आया कि "तृषा उसी समय स्कूल से आई थी और उसने तो खाना भी नहीं खाया था, और उसीने ही क्यों सरिता ने भी तो खाना नहीं खाया था", उसे अफ़सोस हो रहा था कि छोटी सी बात को लेकर उसने इतना बड़ा इस्यु बना दिया। उसने सोचा "अब वह थोड़े समय के लिए उसके साथ रहने वाली है उसे उसका पूरा ध्यान रखना चाहिए, उसे बहुत सी खुशियां देनी चाहिए" उसने तुरंत घर पे फ़ोन लगाया, फ़ोन सरिता ने ही उठाया, राकेश ने  कहा "हैल्लो सरिता, तृषा ने खाना नहीं खाया था, उसे  खाना खिलाया क्या ?"
"बड़ी जल्दी ख्याल आ गया ?... माँ हूँ मैं  उसकी, उसको खाना खिला कर सुला दिया है मैने।" सरिता बोली
"तुमने भी तो खाना  नहीं खाया था" कुछ देर चुप रहने के बाद राकेश ने कहा।
"तुम भी तो यूँही खाए बगैर चले गए तो में कैसे खा सकती हूँ ?"
"लेकिन बाद में तुम कौनसा देखने आओगी कि मैंने खाना खाया यां नहीं" राकेश ने मायूसी से कहा।
"बाद में  तुम शादी कर के किसी और को ले आना। लेकिन  तुमने ही तो कहा था कि जब तक इस घर में हूँ तबतक एक पत्नी की तरह ही रहूँ" फिर थोड़ा रुक कर सरिता ने कहा "तुम भी गुस्से में यूँही  चले गए थे तो कुछ मंगवा कर खा लेना "
"हाँ ठीक है" फिर कुछ रूककर बोला "सुनो क्या ऐसा नहीं हो सकता कि जब तक हम साथ हैं तब तक झगड़ा ना करें ?"
"तो क्या मैं लड़ती रहती हूँ ?"
"तो क्या मुझे पागल कुत्ते ने काटा है जो बैठे बैठे ही तुमसे लड़ना शुरू कर देता हूँ ".
सरिता ने जब देखा कि बात बिगड़ रही है तो उसने फोन काट दिया।

सरिता और राकेश दोनों ही हालाँकि यही सोचते थे कि अब कुछ ही महीने साथ रहना है तो क्यों  ना प्यार से रहें , मगर दोनों का झगड़ा किसी न किसी बात पर हो ही जाता था। यही झगड़ा कई बार तो काफी उग्र स्वरुप लेलेता था।  अब तो दोनों ही को लगने लगा था कि उनके बीच किसी भी तरह का एडजस्टमेंट हो पाना मुश्किल है, सो दोनों ही कोर्ट की मियाद पूरी होने का इंतज़ार कर रहे थे।

वक़्त यूँ ही गुज़रता रहा कभी लड़ते झगड़ते तो कभी थोड़ा प्यार में। अब उनके हमेशा के लिए बिछड़ने का समय नज़दीक आता जाता  रहा था, सिर्फ डेढ़ महीना बाकी बचा था।  मगर इस सब के बीच, घर में एक व्यक्ति ऐसी भी थी जो नहीं जानती थी कि केवल पेंतालिस दिनों बाद उसके नन्हे से जीवन में कितना बदलाव आने वाला है, वो थी तृषा।

सुबहा  का  समय  था, राकेश ऑफिस जाने के लिए निकल रहा था, तभी सरिता  ने  राकेश  से कहा "सुनो मैं आज  अपनी  सहेली आशा से  मिलने जाउंगी, मैंने उसे एक किराए के मकान के लिए कहा था, सो कल उसका फोन आया था, कह रही थी एक मकान है उसकी नज़रों में, बस वही देखने जाना है और अगर जंच गया तो फिक्स कर दूंगी।" राकेश ने सरिता की आवाज़ में छुपे दर्द को महसूस किया। 
राकेश ने सरिता की आँखों में देखा और चुप चाप बिना कुछ बोले निकल गया। सरिता भी उसे दूर तक जाते हुए देखती रही।
रात को खाने की टेबल पर राकेश ने सरिता से पूछा "क्या हुआ उस माकन का जो तुम देखने गयी थीं ?"
सरिता बोली "हां, मकान मालिक को तीन महीने का एडवांस दे दिया, दो कमरों का माकन है, इससे बड़ा करना भी क्या है, सिर्फ मुझे और तृषा को ही तो रहना है। "
उस रात दोनों में इसके इलावा और कोई बात नहीं हुई। दोनों ही किसी गहरी सोच में डूबे हुए थे, सरिता शायद आने वाली उस आंधी के बारे में सोच रही थी जो कितनी ही ज़िंदगियों को तहस नहस कर के चली जायेगी। सच में आदमी वक़्त के हाथों की वो कठपुतली है जो इधर से उधर लुढ़कती रहती है, लोग देखते हैं, तालियां बजाते हैं मगर उस कठपुतली का दर्द कोई नहीं जान पाता।

इसी तरह बीस दिन और बीत गए। एक दिन सरिता ने राकेश से कहा " मुझे एक कंपनी में नौकरी मिल गयी है, एडमिनिस्ट्रेटिव मैनेजर की , तनख्वाह भी अच्छी है, मैंने उनसे एक महीने का समय माँगा हे, ज्वाइन करने के लिए।"
"मगर तुम अगर सारा दिन ऑफिस में रहोगी तो तृषा का ध्यान कौन रखेगा ?" राकेश ने सरिता की तरफ देखते हुए पूछा।
"हाँ मुझे भी उसीकी चिंता है, मगर जॉब तो करनी ही पड़ेगी, वरना घर कैसे चलाऊंगी ? तृषा को सोचती हूँ किसी हॉस्टल में डाल दूंगी।" इतना कहने के बाद सरिता दूर शून्य में कहीं देखने लगी। वह सोच रही थी "आंधियों का सामना करते करते बड़े बड़े पेड़ थक कर गिर जाते हैं तो तृषा तो अभी बहुत ही छोटा पौधा है, वह कैसे सामना करपाएगी इस आंधी का ?"
राकेश भी चुप था ।

आखिर वह दिन भी आ ही गया।
पति पत्नी के तौर पर यह उनका आखरी दिन था, एक दूसरे  के साथ। कल कोर्ट की तारीख थी और वह जानती थी कि राकेश तलाक़ ही मांगेंगे, इसीलिए उसने सोच भी लिया था कि वह भी उस बात के लिए इंकार नहीं करेगी, और दोनों हमेशां हमेशां के लिए जुदा हो जायेंगे।
दोनों ही आज सुबह जल्दी उठ गए थे। दोनों ही ने मन ही मन में यह फैंसला कर लिया था कि आज चाहे कुछ भी हो जाए आज वह किसी भी बात पर झगड़ा नहीं करेंगे। राकेश ने सोचा था कि वह आज सरिता और तृषा के साथ पूरा दिन गुज़ारेगा, उन्हें बाहर घुमाने ले जाएगा, फिल्म दिखायेगा और रात को सरिता की पसंद के किसी होटल में उसीकी पसंद का खाना खिलायेगा।

राकेश जब तैयार होकर नाश्ते की टेबल पर आया तो उसने देखा तृषा और सरिता दोनों ही उसका इंतज़ार कर रहे हैं व नाश्ते की टेबल पर कई तरह की प्लेटें  सजी हुईं थीं। पहले तो उसने कहा "सॉरी थोड़ा लेट हो गया" फिर कुछ रूककर बोला "वाओ, ये क्या सरिता इतनी सारी चीज़ें ?"
"बस आज का दिन ही तो है, मैंने सोचा तुम्हें तुम्हारी पसंद की चीज़ें अपने हाथों से  बनाकर खिलाऊँ, कल तो मुझसे बनाया नहीं जाएगा और शायद तुमसे खाया भी नहीं जाएगा" सरिता का गला भर आया था ये कहते हुए।  
"सरिता मैं भी चाहता हूँ कि आज तुम दोनों को ढेर सारी खुशियां दूँ , फिल्म दिखाने ले जाऊं, तुम्हारी पसंद के किसी होटल में तुम्हारी पसंद का खाना खिलाऊं, पूरा दिन बाहर घूमें हम तीनों। " राकेश ने सरिता से कहा तो सरिता बोली "बाहर ? आज तो में पूरा दिन घर में ही बिताना चाहती हूँ, क्यूंकि कल के बाद तो यह घर भी मेरा नहीं रह जाएगा, फिर तो बाहर ही रहना है ! राकेश आज मैं इस एक दिन में अपनी पूरी ज़िन्दगी जी लेना चाहती हूँ। " कहते कहते सरिता फुट फुट कर रोने लगी।  
राकेश काफी देर उसके सर पर हाथ फेरता रहा। लेकिन आखिर में उन्होंने तय किया कि वे कुछ देर के लिए मार्किट में जाएंगे, दोपहर का खाना किसी होटल में ही खाएंगे और वापस आ जायेंगे। 

कुछ देर बाद वे मार्किट में पहुंचे तो एक शोरूम को देख कर राकेश अंदर चला गया, उसने तृषा के लिए चार पांच ड्रेस खरीदीं और फिर सरिता के लिए साड़ियां देखने लगा। एक साड़ी पर नज़र पड़ते ही उसने सरिता की तरफ देखते हुए कहा "सरिता देखो ये तुम्हारे ऊपर बहुत जंचेगी " 
"मगर मैं कोई साड़ी नहीं लेना चाहती " सरिता ने कहा 
"मगर एक दो तो..... "अभी लफ्ज़ राकेश के मुंह में ही थे कि सरिता चिल्ला पड़ी "नहीं.... नहीं चाहिए मुझे, नहीं पहन पाऊँगी मैं, नहीं पहन पाउंगी" कहती हुई वह बाहर की तरफ दौड़ गई। 
सभी अचंभित से उसे व राकेश को देखते रहे।

घर पहुँच कर सरिता रात का खाना  बनाने में लग गई। तृषा अपने पापा के पास बैठी थी, वह आज बहुत ही खुश नज़र आ रही थी। उसने इसी ख़ुशी का इज़हार करते हुए अपने पापा से कहा "पापा आप बहोत अच्छे हो",  राकेश ने उसे अपनी गोद में उठा लिया और अपने सीने से लगाता हुआ बोला "नहीं बेटा मैं बहुत ख़राब हूँ.... बहुत ही खराब हूँ मैं। मुझे माफ़ करदेना मेरी बच्ची"  राकेश की आँखें भर आयीं।

रात के खाने में सरिता ने राकेश के पसंद की कईं चीज़े बनाईं थीं । खाना खा कर तृषा सो गई मगर सरिता और राकेश की आँखों में नींद नहीं थी, सरिता राकेश के पास बैठी हुई थी, उसका हाथ राकेश के हाथ में था और शुन्य में देखती हुई उसने कहा "मैं कितनी खुश थी जब इस घर में आई थी,मुझे याद आ रहे हैं वो पल, वो दिन, मगर सबकुछ कितनी जल्दी बदल गया, आज मैं इस तरह तुम्हारे हाथों में हाथ रख कर बैठी हूँ, मगर कल सब कुछ बदल चूका होगा" फिर थोड़ा सा रूककर बोली "देखो किचेन में नीचे दाहिनी तरफ के कपबोर्ड  में सभी दालों के डिब्बे पड़े हैं, चीनी का डिब्बा व चाय पत्ती का डिब्बा ऊपर शेल्फ पर ही पड़ा होता है, फ्रीज में अभी तीन चार दिन चलजाएँ उतनी सब्ज़ियाँ पड़ी हैं, किसी खाना बनाने वाली को रख लेना, खाना ठीक समय पर खाना व शाम को टाइम से ही घर आजाना।"
"किसके लिए ?" राकेश की आवाज़ में मायूसी थी।
"तुम शादी कर लेना" सरिता ने राकेश से कहा।
कुछ देर सरिता को देखते रहने के बाद राकेश ने कहा "तुम भी अपनी नौकरी से टाइम पर घर आजाया करना, और अपनी दवाई ठीक से लेती रहना, अपनी बीपी की गोलियां रखलेना और मैं अपने बारे में तो कुछ नहीं कहता, मगर तुम कोई   कोई अच्छा सा आदमी देख कर उससे शादी कर लेना। जो मेरी तरह तुमसे झगड़ा ना करे। एक औरत के लिए अकेले पूरी ज़िन्दगी गुज़ारना बड़ा ही मुश्किल होता है।"  राकेश ने कहा तो सरिता की आँखों से आंसू बहने लगे।आँखों के आंसूओं को पोंछते हुए उसने कहा "कितना अजीब लगेगा कल जब मैं सरिता श्रीवास्तव से सिर्फ सरिता रह जाउंगी।" उसने राकेश की आँखों में देखा और वह अपने आप को रोक नहीं सकी, फूट फूट कर रोने लगी। 

दोनों देर तक इसी तरह बातें करते रहे और बातों ही बातों में कब सुबहा हो गई पता ही नहीं चला। 
सुबहा घर से निकलते हुए सरिता ने बड़ी ही हसरत से अपने घर को देखा, आँखें भरी हुईं थीं और मन में माँ भगवती का जाप कर रही थी। 
जैसे ही कार कोर्ट के मुख्य द्वार के  पास पहुंची तो सरिता ने राकेश की आँखों में  देखते हुए कहा "मुझे तलाक़ नहीं देना राकेश, मैं और तृषा बिखर जाएंगे, मुझे तलाक़ नहीं चाहिए " और वह फूट फूट कर रोने लगी। 
राकेश ने उसे थामते हुए कहा "हे, सरिता सम्भालो अपने आप को, ये क्या हो गया है तुम्हे ?" 

सरिता यूँही कुछ देर रोती रही और फिर अपने आप को संभालती हुई कार से उतर कर अपने वकील से मिलने चली गई।      
राकेश भी अपने वकील की ऑफिस की तरफ चलदिया। अब सरिता बैचेनी से इंतज़ार कर रही थी, राकेश के स्टैमेन्ट का। 
करीब बारह बजे उनका नाम पुकारा गया। दोनों जज साहब  के सामने थे। जज साहब ने राकेश को कटघरे में आने को कहा, पूछा 
"बताइये क्या फैसला किया आपने ? आज आप लोगों के छः महीने की मियाद पूरी हो गई है, आप दोनों ही समझदार हो और आपने अपनी बच्ची के भविष्य के बारे में भी सोचा होगा , बताइये मिस्टर राकेश क्या फैसला है आपका?" जज साहब ने पूछा तो राकेश दो मिनट यूँही शुन्य में देखता रहा, फिर उसने सरिता की तरफ देखा जो सिमटी सी, डरी डरी सी, बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी राकेश के उत्तर का। 
सरिता का  दिल ज़ोरों से धड़क रहा था, उसने फैंसला किया था कि राकेश के तलाक़ का वह विरोध नहीं करेगी। 
"बोलिए मिस्टर राकेश" जज साहब ने फिर दोहराया। 
"जज साहब, मैं तलाक़ लेना चाहता हूँ" राकेश के ये बोल पिघले सीसे की तरह सरिता के कानों में उतरते चले जा रहे थे। राकेश ने सरिता की तरफ देखा फिर  कुछ रूककर आगे  बोला "मेरा यही सोचना था, आखरी समय तक, मगर पिछले कुछ  दिनों में मैंने सरिता के दिल का वह दर्द महसूस किया, उसकी आँखों की उदासी को देखा, मैंने तृषा की जगह खुद को बैठा कर देखा, और मैंने खुद को इन दोनों के बिना अकेले रख कर देखा, तो मैंने महसूस किया दिलों के रिश्ते इन तलाक़ के कागज़ों से नहीं टूट सकते। मैं अपनी पत्नी और बच्ची के बगैर मर जाऊँगा "
सरिता की आँखों से ख़ुशी के आंसू बहने लगे, वह भी तबतक राकेश के पास आगई थी, उसे अपने गले से लगाते हुए राकेश  बोला "पिछले दो दिनों में मैंने महसूअ किया मैं तुम्हारे बिना कुछ भी नहीं, इन दिलों के रिश्ते को कोई नहीं तोड़ सकता। सरिता चलो वापस अपने घर, वो घर तुम्हारा है और हमेशां तुम्हारा ही रहेगा, उस घर में मैं तुम्हारे बिना किसी और की कल्पना भी नहीं कर सकता, तुम सरिता श्रीवास्तव हो और हमेशा इसी नाम से जानी जाओगी।

और दोनों एक दूसरे का हाथ थामे चलदिये अपने घर की ओर।  
दोनों ही की आँखों में आंसू थे, मगर ख़ुशी के।    

Kapildev Kohhli

Friday, August 1, 2014

भूत - The Ghost





भूतों का नाम सुनते ही बच्चे तो डर जाते ही हैं, बड़ों की भी रूह कांप जाती है। बचपन ही से सभी भूतों की बड़ी ही अजीब व डरावनी कहानियां सुनते आये हैं और आगे अपने बच्चों को भी शांत करने के लिये वही कहानियां दोहराते रहे हैं, मगर, अगर कोई उनसे किसी जगह पर भूत होने के बारे में कहदे तो वह खुद भी उस जगह जाने से डरने लगते है। भूत शुरू ही से एक भयानक व डरावना चरित्र रहा है सभी के लिये।

लेकिन गांव में एक ऐसा व्यक्ति भी था जिसने आदमी की इसी कमज़ोरी और डर को अपनी जीविका का साधन बना लिया था।  प्रताप नाम था उसका, क़द पांच फ़ीट, नाटा सा दिखने वाला, मगर अपने इसी छोटे कद का उसने  भरपूर फायदा उठाया था। भूत नाम के  इसी डर का फायदा उठाता था वह, इसी डर को उसने अपना धंधा बना लिया था और उससे होने वाली आय से उसका और उसके परिवार का गुज़ारा बड़े ही मज़े से होता था। इसीलिए रोज़ रात को वह घर से अपना बैग लेकर निकल जाता था और सुबह होने से पहले ही घर वापस लौट आता था। गाँव के लोग तो यही जानते थे कि प्रताप रात को नौकरी जाता है, वह कहां नौकरी करता है व क्या करता है ये कोई भी नहीं जानता था।


शहर से दूर शहर में आने  के दो रस्ते थे, एक को चौड़ी  सड़क के नाम से जाना जाता था,जहाँ से शहर में आने के लिए काफी घूम कर आना पड़ता था और दूसरी थी पतली सड़क। दोनों ही से शहर में आया जा सकता था,मगर चौड़ी सड़क से आने पर काफी घूम कर आना पड़ता था जिससे करीब १५ से २० किलोमीटर का अंतर बढ़ जाता था। इसलिए ज़्यादातर लोग शहर में जाने के लिए दिन के समय पतली सड़क का ही इस्तेमाल करते थे। मग़र रात में लोग अक्सर चौड़ी सड़क  से ही शहर में जाना पसंद करते थे। क्युकी रात में जिन लोगों ने पतली सड़क का इस्तेमाल किया था उन्ही के मुंह से पुरे शहर में यह बात फ़ैल गई  थी की "पतली सड़क पर रातको भूत निकलता है जो कुछ बोलता नहीं सिर्फ हाथ आगे कर देता है, अपने पास का सारा सामन व पैसा दे देने पर वह किसी से कुछ नहीं कहता और वह लोगों को जाने देता है। सर नहीं है उस भूत का।" लोग रात के सन्नाटे में अपने सामने भूत को देख कर वैसे ही घबरा जाते थे और अपना सारा सामान व पैसे छोड़ कर अपनी जान बचा कर भाग जाते थे।


इन्ही कहानियों की वज़ह से अब रात में लोगों ने पतली सड़क से जाना बंद कर दिया था। अब सिर्फ़ वही लोग रात को पतली सड़क से जाते थे जो बाहर से पहली बार इस शहर में आ रहे हैं, यां जिन्हे बहुत ही जल्दी होती थी। इसी वजह से जैसे जैसे पतली सड़क पर भूत होने की बात फैलती जा रही थी वैसे वैसे प्रताप की आय भी कम होती जा रही थी।


रात  के करीब 11.30 का समय था। बारिशों का मौसम था, हल्की  हल्की फुहार हो रही थी,प्रताप ने अपनी घडी की तरफ देखा,अपना बैग उठाया, बैग को अपनी साईकिल के पीछे के कर्रिएर पर बाँधा और चलदिया पतली सड़क के घने जंगलों की तरफ।  


पतली सड़क के घने जंगल में पहुँच कर एक बड़े से बरगद के पेड़ के पीछे उसने  अपनी साईकिल छिपा  कर रख दी  व बैग में से अपनी ड्रेस निकालने लगा। यह वही ड्रेस थी जिसे पहन कर वह लोगों के सामने भूत बनकर जाता था। पूरी ड्रेस एक एस्ट्रोनॉट की ड्रेस जैसी थी,फर्क सिर्फ यह था कि इसमें उसका मुंह पूरा अंदर छुप जाता था,जिसकी वजह से ऊपर का हिस्सा गर्दन बगैर का दिखता था। इसी वजह से लोग जब भी रात के अँधेरे में उसे देखते तो यही समझते कि सर बगैर का भूत आ रहा है।जिस हिस्से में उसकी आँखें थीं वहां पतला कपडा होने की वज़ह से वह आने जाने वाले वाहन व व्यकि को देख पाता था।


अब तक बारिश काफी तेज़ हो चुकी थी। रात के सन्नाटे में मेंढकों की ट्रे ट्रे की आवाज़ एक अजीब किस्म का डरावना माहोल पैदा कर रही थी। अभी उसने ड्रेस निकाल कर पहननी शुरू ही की थी कि सामने से आती हुई एक कार सन्नाटे को चीरती हुई फर्राटे से निकल गई। कार की गति इतनी तेज़ थी कि देखने से ही लगता था उसमे बैठा व्यक्ति जल्द से जल्द उस घने जंगल को पार कर लेना चाहता था। अपने सामने अपने शिकार को जाता देख प्रताप थोड़ा मायूस हो गया। उसने सोचा "आजकी रात की शुरुआत ही बड़ी ख़राब हुई ".


१५ से २० मिनट में वह अपने भूत वाले गेटअप में आ चूका था। अब वह वहीँ बरगद के पेड़ के निचे बैठ कर कान लगाकर दूरसे आने वाले किसी भी वाहन की आवाज़ सुनाई देने का इंतज़ार करने लगा।

रात काफी गहराती जा रही थी,बारिश भी काफी तेज़ हो रही थी, हवा भी काफी तेज़ चल रही थी और साथ ही मेंढकों की आवाज़ भी काफी तेज़ हो गई थी। ये सभी मिलकर माहौल को काफी भयावना बना रहे थे। तभी एक पक्षी शायद बारिश के पानी से बचने के लिए किसी सुरक्षित जगह की तलाश में उड़ा, उसके पंखों की आवाज़ प्रताप के  कानों के पास से होकर गुज़र गई। एक बार तो प्रताप भी काँप गया। उसने अपनी चारों ओर नज़रें घुमा कर देखा तो  उसे आज वह माहौल काफी डरावना लग रहा था।  इस समय इस सियाह अँधेरी  रात में उसके इलावा इस जंगल में कोई नहीं था। हर आहट पर वो चौंक जाता था। रात इतनी भयानक हो गई थी  कि दूसरों को डराने वाला प्रताप आज  खुद  एक अजीब सा डर महसूस कर रहा था। वह सोचने लगा "वह बरसों से इस जंगल में इसी तरह अकेले रात गुज़ारता रहा है,फिर आज ऐसी क्या बात थी जो  वह आज दिल ही दिल में इतना डर महसूस कर रहा है ?"  तभी बादलों की ज़ोरदार गर्जना ने उसको फिर चौंका दिया। काली गहराती रात और  इस घने जंगल में इस समय वह  अकेला ही था, यह सोच कर इस ठन्डे मौसम में भी पसीने  छूट रहे थे। आज पता नहीं क्यों उसे इस जंगल में ठहर पाना बड़ा ही मुश्किल लग रहा था। उसे ऐसा महसूस हो रहा था कि जैसे वहां उसके इलावा भी कोई मौजूद है।  वह सोचने लगा "क्यों ना आज वापस घर लौट जाए ?" अभी वह इन्हीं सोचों में डूबा हुआ था की अचानक उसके पीछे से किसीके चलने की आवाज़ ने उसे चौंका दिया। यह जूतों के चरमराने की आवाज़ थी। उसने घबरा कर तुरंत ही पीछे की तरफ देखा तो वहां कोई भी नहीं था। उसका दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। उसने आज रात यहाँ से भाग जाने में ही बेहतरी समझी। उसने वापस घर लौट जाने का मन बनाया ही था कि तभी अचानक उसे दूर से किसी कार के आने की आवाज़ ने चौंका दिया, उसने सोचा यह एक शिकार कर के वह वापस लौट जाएगा। वह तेज़ी से चलकर सड़क के किनारे एक बड़ेसे पेड़ के पीछे छुप गया। अब हवा काफी तेज़ हो चली थी, तभी कहीं पास ही में एक पेड़ चरमरा कर  गिरा , उसकी आवाज़ से प्रताप सिहर उठा।


कार की आवाज़ अब नज़दीक आती जा रही थी। कुछ ही पलों में उसे कार की हेडलाइट्स दिखाई देने लगी थी, कार काफी नज़दीक आती जा रही थी। तभी प्रताप पेड़ के पीछे से निकल कर सड़क के बीचों  बीच आकर अपने दोनों हाथ चौड़े कर के खड़ा हो गया। कुछ ही दुरी पर कार की गति धीमी पड़ गई,अब धीरे धीरे सरकती वह कार उसके नज़दीक आती जा रही थी। हेडलाइट्स की रौशनी आँखों में पड़ने की वजह से वह देख नहीं पा रहा था कि कार कौन चला रहा है यां कितने लोग बैठे हुए हैं। बारिश भी  काफी तेज़ थी इसलिए कार के दोनों वाइपर  चल रहे थे , तभी प्रताप की कुछ दुरी पर ही कार रुक गई। बिना सर का वह आदमी, प्रताप, धीरे धीरे उस कार की तरफ बढ़ रहा था। कार के पास पहुँच कर उसने कार के अंदर  झाँकने की कोशिश की जैसे ही कार के अंदर उसकी नज़र गई तो उसे लगा उसके पाँव के निचे से ज़मीन सरक रही है,आँखें फटी की फटी रह गईं। किसी जुड़ी के मरीज़ की तरह उसका पूरा बदन काँप रहा था। उसका दिल  धोंकनी की तरह धड़कने लगा। कार के अंदर कोई भी नहीं था, ना कोई चालक और ना ही कोई पैसेंजर। प्रताप को लगा जैसे उसके शरीर का पूरा खून जम गया है। इससे पहले कि प्रताप कुछ सोच पाता अचानक एक हलकी सी खट की आवाज़ के साथ कार की हेडलाइट्स बंद हो गईं। प्रताप स्तब्ध सा खड़ा रह गया। तभी अचानक कार फिर स्टार्ट हुई थोड़ी आगे बढ़ी, आगे जा कर रुकी  और फिर रिवर्स में आती हुई प्रताप के पास आ कर खड़ी हो  गई।


प्रताप  की घिग्गी बंध गई थी वो ना तो कुछ बोल पा रहा था और ना ही चिल्ला पा रहा था। उसने देखा इस घनी अँधेरी रात में वह इस खाली कार के सामने बिलकुल अकेला खड़ा था। उसने पहली बार उस डर को महसूस किया जिसको हथियार बना कर वो अपना और अपने बच्चों का पेट पालता था। प्रताप वहां से भाग  जाना चाहता था, मगर उसके पाँव उठ नहीं रहे थे। वह वहीँ पर बेहोश हो कर गिर पड़ा।


पता नहीं वह कब तक यूँही बेहोश पड़ा रहा,जब उसे होश आया तब तक सुबह होने को थी,अँधेरा अभी पूरी तरह से  छंटा  नहीं था, बारिश रुक चुकी थी। अचानक उसे याद आया कि वह यहाँ इस हालत में क्यों था, तो उसने चौंक कर अपनी दाहिनी ओर सड़क की तरफ देखा, वहां कोई कार नहीं थी। वह तुरंत वहां से उठा और अपनी भूतों वाली ड्रेस को वहीँ छोड़ भाग खड़ा हुआ।

उस रोज़ के बाद प्रताप ने कभी भी पलट  कर उस पतली सड़क की तरफ नहीं देखा।   


Romy Kapoor (Kapildev)