Monday, July 28, 2014

Kapildev Kohhli's Blogs: कॉफ़ी हाउस - A Short Story

Kapildev Kohhli's Blogs: कॉफ़ी हाउस - A Short Story: हरीश अभी कॉलेज के दूसरे वर्ष में पढता था। घर में पिताजी थे जो एक सरकारी मुलाज़िम थे, मिस्टर भाटिया के नाम से ही जाने जाते थे, माँ ...

Saturday, July 26, 2014

कॉफ़ी हाउस - A Short Story








हरीश अभी कॉलेज के दूसरे वर्ष में पढता था। घर में पिताजी थे जो एक सरकारी मुलाज़िम थे, मिस्टर भाटिया के नाम से ही जाने जाते थे, माँ थी जो छोटी सी प्राइमरी स्कूल में शिक्षिका थीं, राधा नाम था उनका, मगर वह भी मिसेज़ भाटिया के नाम से ही जानी जातीं थीं और एक छोटी बहन थी जो अभी १० वीं कक्षा में पढ़ती थी। छोटा सा परिवार था और हरीश के पिताजी व माँ जो भी कमाते थे उससे घर का खर्चा ठीक से चल ही जाता था। चूँकि बेटी १० वीं कक्षा में थी सो उसकी ट्यूशन वगैरा पर काफी खर्च हो जाता था। इस महंगाई में दो बच्चों को पढ़ाना और महीने भर का खर्च चलाना, महीना पूरा होते होते तो अगले महीने की तनख्वाह का इंतज़ार होने लगता था।

हरीश कॉलेज में पढता था मगर अपने दोस्तों के बीच खर्च करने के लिए  उसकी जेब में बहुत ज़्यादा पैसे नहीं होते थे।  ज़्यादातर ख़र्चा उसके अमीर दोस्त ही करते थे। कई बार  इस बात के लिए उसे मन ही मन में शर्मिंदगी महसूस होती थी, मगर वह मजबूर था।

छुट्टी का दिन था, हरीश ड्राइंग  रूम में दीवान पर लेटा टीवी पर फिल्म देख रहा था, मम्मी रसोई में शाम का खाना बनाने में लगी हुई थी और पिताजी अपने ही किसी काम में उलझे  हुए थे, व छोटी बहन अपनी किसी सहेली के यहां गई हुई थी। तभी अचानक घर का डोर बेल बजा। हरीश ने तुरंत उठ कर दरवाज़ा खोला तो सामने अपने पिताजी के ऑफिस के एक मित्र और उनकी पत्नी को खड़ा पाया।
"नमस्ते अंकल, नमस्ते आंटी आइए ना " हरीश ने शिष्टता पूर्वक दोनों का स्वागत करते हुए कहा।
"नमस्ते बेटा क्या हाल है ? कॉलेज की तुम्हारी पढाई कैसी चल रही हे ?" सूरजप्रकाश ने भी शिष्टता दिखाते हुए पूछा।
"मैं बिलकुल ठीक हूँ और पढाई भी अच्छी चल रही हे " हरीश ने जवाब   दिया।  
"पापा, मम्मी हैं घर में ?"
शायद हरीश के पिताजी ने अपने दोस्त की आवाज़ अंदर ही से सुन ली थी, सो तुरंत दरवाज़े के पास आते हुए कहा "अरे हाँ भाई आओ, आओ। अरे भाई सुनती हो देखो सूरजप्रकाश जी और भाभीजी आये हैं "
"आई" हरीश की मम्मी ने अंदर ही से आवाज़ दी।
दोनों  अंदर आकर सोफे पर बैठ गए।

हरीश के मम्मी और पिताजी घर आये मेहमानों के साथ बतियाने लग गए,  हरीश को महसूस हुआ कि वहां उसका कोई काम नहीं है तो वह उठ कर दूसरे कमरे में चला गया और  मोबाइल पर अपने किसी दोस्त के साथ बतियाने लगा।  उसे अफ़सोस ज़रूर था की उसकी फिल्म अधूरे में ही छूट गई। करीब १५ से २० मिनट के बाद हरीश की मम्मी कमरे में आई और 200 रुपये हरीश के हाथ में थमाते हुए कहा " हरीश ये लोग काफी दिनों बाद आये हैं और जब भी इनके घर जाएँ तो काफ़ी खातिरदारी करते हैं। घर में इस समय कुछ भी नहीं है जो मैं चाय के साथ उनके आगे रखूं। तुम ज़रा जल्दी जाओ और बाज़ार से कुछ गर्म समोसे व साथ में बिस्किट व अपने हिसाब से एकाद चीज़ और भी ले आना। तब तक मैं चाय का पानी चढ़ाती हूँ, ज़रा जल्दी आना। " कहती हुई वह रसोई घर की तरफ बढ़ गई। हरीश मोबाइल को रखकर बाथरूम में हाथ मुंह धोने चला गया। बाथरूम से निकल कर अभी वह कपडे चेंज कर रहा था कि उसकी मम्मी ने आते ही कहा "अरे अभी तुम यहीं खड़े हो, उधर मैने चाय का पानी भी चढ़ा दिया है। जल्दी जाओ।" हरीश तुरंत ही बाहर की तरफ भागा और अपनी बाइक को स्टार्ट करता हुआ मार्किट की तरफ चलदिया।

मार्किट में दुकान के सामने अभी अपनी बाइक को रोका ही था कि  पीछे से उसके कंधे पर किसी ने हाथ रख दिया। हरीश ने चौंक कर पीछे देखा तो ख़ुशी के मारे उसका चेहरा खिल उठा। सामने सुलेखा खड़ी थी। सुलेखा उसीके साथ कॉलेज में पढ़ती थी,दोनों में गहरी दोस्ती थी और दोनों काफ़ी देर तक कॉलेज की कैंटीन में बैठे बातें करते रहते थे।  

"सुलेखा तुम यहां ? व्हाट अ प्लीजेंट सरप्राइज ?" अपनी फटी आँखों से सुलेखा को देखते हुए हरीश बोला
"क्या बात है इतने भौचक्के क्यों हो ?" सुलेखा  ने भी चुटकी लेते हुए पूछा।
"अरे कुछ नहीं बस तुम्हे अचानक इस समय यहाँ देख कर आश्चर्य हो रहा है।" हरीश ने मुस्कुराते हुए कहा।
"क्यों भुलक्कड़, भूल गए ? मैंने तुम्हें कहा तो था कि मेरी मौसी की लड़की यहाँ से थोड़ी दूरी पर ही रहती है।  मैं उसीसे मिलने आई थी। "
"अरे तो मुझे फ़ोन तो करतीं " हरीश ने नाराज़गी जताते हुए कहा।  
"वहां से निकल कर वही तो इतनी देर से कर रही थी मगर जनाब फ़ोन ही नहीं उठा रहे" सुलेखा ने मुस्कुराते हुए कहा। तुरंत ही हरीश ने अपनी जेबें टटोलीं और मायूसी के साथ बोला "ओह शिट, मोबाइल तो घर में ही रह गया !" कुछ देर दोनों वहीँ खड़े बातें करते रहे फिर अचानक सुलेखा ने कहा "यहीं पास में ही कॉफी हाउस है, वहीँ चलकर बैठते हैं। " 
"मगर ..... ?" हरीश कुछ सोचता हुआ बोला। 
"अगर मगर कुछ नहीं चलो बाइक स्टार्ट करो।" सुलेखा ने कहा तो  हरीश ने पहले कुछ सोचा, फिर मुस्कुरा कर अपनी बाइक स्टार्ट करके सुलेखा को पीछे वाली सीट पर  बिठा कर चल पड़ा, कॉफी हाउस की तरफ। वह खुश था कि आज सुलेखा उसे मिली तो उसकी जेब में दोसौ रुपये थे। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। वह अपने आप को बहुत ही रईस समझ रहा था।  

हरीश को घर से गए आधे घंटे से भी ज़्यादा का समय हो चला था और मिसेज़ भाटिया की नज़रें बार बार बहार की तरफ उठ जातीं थीं।उन्होंने एक बार उसे मोबाइल पर भी ट्राय किया, मगर जब रिंग बजी तो पता चला जनाब मोबाइल तो घर पर ही छोड़ गए हैं। चाय का पानी खौल कर सूख चूका था, तो उन्होंने पतीली में फ़िर एकबार चाय के लिए पानी डाल दिया।  

"भाभी जी आप कुछ परेशान लग रहीं हैं ? क्या बात है सब ठीक तो है ना ?" सूरजप्रकाश ने मिसेज़ भाटिया की बेचैनी को भांपते हुए पूछा। 
"नहीं ऐसी कोई बात नहीं " मिसेज़ भाटिया ने झेंपते हुए जवाब दिया। 

वे लोग कुछ देर बातें करते रहे सूरजप्रकाश ने मिस्टर भाटिया की तरफ देखते हुए कहा  "नयी सरकार से लोगों को उम्मीदें तो बहुत हैं क्या लगता है यार, मोदीजी उन उम्मीदों पर खरे उतरेंगे ?"

वे बोले "लगता तो है, क्यूंकि सुना है उन्होंने गुजरात में काफी डेवलपमेंट किया है। मगर टाइम तो चाहिए किसी भी काम को करने के लिए। "
"वो तो सही है और वैसे भी वह खुद एक गरीब परिवार से आएं हैं तो उनकी ज़रूरतों को समझते होंगे। बचपन में चाय बेचा करते थे। "

'चाय'! चाय  से मिसेज़ भाटिया को याद आया वे भी गैस के ऊपर चाय का पानी चढ़ा कर आयीं हैं। वह तुरंत अंदर भागीं, देखा तो दुबारा चढ़ाया हुआ पानी भी सूख चूका था। उन्हें चिंता हो रही थी ऐसा क्या हो गया जो अभीतक हरीश आया नहीं। उन्होंने गैस को बंद करदिया और अंदर आकर बैठ गयीं।
"काफ़ी देर हो गई है अब हमें चलना चाहिए " सूरजप्रकाश ने कलाई पर बंधी घडी की तरफ देखते हुए कहा 
"अरे ऐसे कैसे बिना चाय पिए। अरे राधा जाओ चाय वाय ले आओ। " मिस्टर भाटिया ने कहा तो मिसेज़ भाटिया उठ कर अंदर चली गईं। कुछ ही मिनटों बाद  मिस्टर भाटिया भी उठ कर अंदर चले गए। इसी तरह बड़ी देर से चल रहा था, कभी एक अंदर जाता तो कुछ मिनटों बाद दूसरा भी उसके पीछे पीछे चला जाता फिर एक मुस्कुराता हुआ कमरे में आकर बैठ जाता तो कुछ मिनटों बाद दूसरा भी मुस्कुराते हुए आकर बैठ जाता, मगर चाय फिर भी नहीं आ रही थी। 
मिस्टर भाटिया अंदर गए ही थे कि तभी झल्ला कर सूरजप्रकाश की पत्नी ने धीरे से सूरजप्रकाश की तरफ देखते हुए गुस्से में कहा "आज आप घर चलो फिर बताती हूँ, वो जब भी आते हैं तो मेरे पीछे पड़ जाते हो ये भी रखो वो भी रखो, देख लिया एक घंटे से यहाँ तो चाय भी नहीं आ रही है। पता नहीं हो क्या रहा है एक अंदर जाता है तो दूसरा मुस्कुराते हुए उसके पीछे पीछे चला जाता है और फिर एक यहाँ आकर बैठता है तो दूसरा भी थोड़ी देर में मुस्कराते हुए आकर बैठ जाता है।  लेकिन चाय नहीं आ रही है।  तुमसे कहा था घर से चाय पी कर चलते हैं, तो कहने लगे "नहीं नहीं अपने दोस्त के वहां ही जाकर पिएंगे।" अब पियो चाय अपने दोस्त के घर की। शाम की चाय नहीं पीने की वजह से मेरा तो सर भी भारी हो गया है।" 
"अरे तुम भी ना कैसी बातें करती हो, मैं जानता हूँ उसे ऐसे थोड़े ही जाने देगा! तुम ज़रा धीरज रखो। " और सूरजप्रकाश अपनी पत्नी को शांति बनाये रखने की सलाह देने लगे।

उधर अंदर जा कर मिस्टर भाटिया ने अपनी पत्नी पर झल्लाते हुए कहा "कहाँ रह गया तुम्हारा शहज़ादा ? एक घंटा होने को है ? कुछ सोच कर फ़िर बोले " वो मै तीन चार दिन पहले सेव व शक्करपारे लाया था वो कहाँ गए ? "
"तुम्हारा लाडला जब भी टीवी पर कोई फिल्म देखने बैठता है तो कोई  न  कोई चीज़ लेकर  बैठ जाता है, मै क्या  करूँ ?" उनकी पत्नी ने कहा 
"अरे तो बेसन वगेरा  होगा उसीके पकोड़े बनालो "
" तुम्हारी बेटी ने कल ही पकोड़े बनाये थे, बेसन उसीने खत्म कर दिया है।" मिसेज़ भाटिया ने डरते हुए कहा।  
"पता नहीं तुम लोग क्या क्या बना कर खाते रहते हो मुझे तो कुछ नहीं मिलता।" झल्ला कर मिस्टर भाटिया ने कहा  "लेकिन मेरी तो नाक  कटवा दी, वो लोग क्या सोचेंगे ?"

मिस्टर भाटिया मुस्कुराते हुए आये और अंदर कमरे में बैठ गए।  कुछ ही मिनटो बाद मिसेज़ भाटिया भी मुस्कुराती हुईं अंदर कमरे में दाखिल हुईं। सूरजप्रकाश  की पत्नी  ने देखा उसके हाथ में चाय नहीं थी। उसने कनखियों से अपने पति की और देखा और फिर मिसेज़ भाटिया की तरफ देखते हुए बोली "अब हमें चलना  चाहिए काफी देर हो गयी है। " सूरजप्रकाश की पत्नी ने कहा तो सूरजप्रकाश भी समझ गए थे कि अब ज़्यादा बैठना मुमकिन नहीं  है। 

मिसेज़ भाटिया भी अब भांप चुकीं थीं कि अब और इंतज़ार करना बेकार है। उन्हें अंदर ही अंदर चिंता भी लगी  हुई थी कि कहीं कोई घटना तो नहीं हो गई और हरीश के बेफ़िकरेपन पर गुस्सा भी आ रहा था।  वह अंदर गई और प्यालों में चाय भर कर ले आई। ट्रे में सिर्फ चाय देख कर सूरजप्रकाश की पत्नी ने आँखें घुमा कर  उनकी तरफ देखा तो वह समझ गए कि वह क्या कहना चाहती है, उन्होंने तुरंत अपनी नज़रें झुकाली।   

हरीश अपनी कलाई  पर  बंधी घडी की तरफ देखते हुए सुलेखा से बोला "बड़ी देर हो गयी, तुम्हारे साथ तो वक्त का पता ही नहीं चला, अब हमें चलना चाहिए। " वेटर बिल ले आया ,बिल देने के लिए सुलेखा ने जैसे ही अपना पर्स खोलना चाहा तो हरीश ने उसका हाथ थiमते हुए कहा "आज नहीं" और हरीश ने सौ-सौ रुपये के दो नोट निकाल कर वेटर के हाथों में रख दिए। वेटर कुछ  देर  बाद लौटा और  बकाया तीस रुपये हरीश के हाथों में थमाते हुए सैल्यूट  मारा तो हरीश ने उसमें से पांच रपये का नोट वेटर को देते हुए सुलेखा के  साथ आगे  बढ़ गया। अब उसका पूरा ध्यान घर में होने वाले महाभारत पर केंद्रित था। वह जानता था कि घर पहुँच कर उसे किन परिस्थितियों  का सामना करना पड़ेगा। 
  
सूरजप्रकाश को गए करीब पौना घंटा बीत चूका था, तभी हरीश ने अपनी बाइक के साथ घर में प्रवेश किया। उसने देखा उसके मम्मी - पापा दोनों ही बाहर आँगन में बेचैनी से टहल रहे थे। उसे देखते ही हरीश के पिताजी लपक कर उसके पास आये और ज़ोर से चिल्ला कर बोले "कहाँ रह गए थे ? कोई ज़िम्मेदारी का अहसास है कि नहीं? वो लोग क्या सोचते होंगे, तुमने तो मेरा मज़ाक ही बना दिया आजतो" । 
"पापा पैसे कहीं रास्ते में गिर गए थे काफी देर ढूंढता रहा पर नहीं मिले,  सॉरी।" काफी देर उसके माता पिता उसे भला बुरा कहते रहे, मगर फिर सब कुछ शांत हो गया। 

अगले दिन सुबह हरीश अपने कॉलेज चला गया। उसकी मम्मी  ने कपडे धोने के लिए जब उसकी जेबें टटोलीं तो उसके हाथ एक बिल लगा, उसने देखा वह कॉफ़ी हाउस  का १७० रुपये का बिल था, उसके ऊपर कल की तारीख थी। वह सबकुछ  समझ गई। पहले तो उसने सोचा कि अपने पति को  बतादे मगर फिर कुछ सोच कर चुप रह गई। 
वह सोचने लगी "क्या कम जेब खर्च मिलने की वजह से बच्चे ऐसी हरकतें करते हैं कि उन्हें अपने माता पिता से भी झूठ बोलना पड़े !" वह खामोश थी मगर गहरी चिंता में डूबी हुई थी। 

Romy Kapoor (Kapildev)


Monday, July 14, 2014

Kapildev Kohhli's Blogs: सफ़र - A Short Story

Kapildev Kohhli's Blogs: सफ़र - A Short Story: बहुत ही खुश थे हम उसदिन। हमारे यहाँ बेटा हुआ था। मैं जब अंदर कमरे में  दाखिल हुआ तो  संजना ( मेरी पत्नी ) पलंग पर लेटी हुई थी और पास में ही...

सफ़र
















बहुत ही खुश थे हम उसदिन। हमारे यहाँ बेटा हुआ था। मैं जब अंदर कमरे में  दाखिल हुआ तो  संजना ( मेरी पत्नी ) पलंग पर लेटी हुई थी और पास में ही हमारा बेटा सोया हुआ था। मैंने  मुस्कुरा कर संजना की तरफ देखा तो उसकी आँखों में एक अजीब सी ख़ुशी थी और साथ ही गुरूर था उसके चेहरे पर, जैसे बहुत  बड़ा किला फतह कर लिया हो ! मैं अपने बेटे के पास गया और प्यार से उसका माथा चूम लिया। मैं उसे गोद में उठाना चाहता था मगर  उस नन्ही सी जान को  गोद में उठाने की हिम्मत नहीं हुई मेरी। मै प्यार से उसके कोमल गालों पर अपनी उंगलियां घुमाता रहा। नन्ही सी उँगलियों से उसने अपनी मुट्ठी बंद कर रखी थी।  मैंने  बड़े ही प्यार से उसकी बंद मुठ्ठी को खोला और अपनी पहली उँगली उसकी हथेलियों पर रख दी , उसने तुरंत ही फिर अपनी उगलिया भींच दीं और मेरी ऊँगली  को कस के पकड़ लिया। मुझे बड़ा ही गर्व सा महसूस हो रहा था, मुझे लगा जैसे वह मुझसे कह रहा हो 'पापा अब मै आपकी यह ऊँगली आपकी आखरी सांस तक नहीं छोड़ूंगा ' मेरा सीना गर्व से फूल गया था।

हमने उसका नाम रोहित रखा था। रोहित के घर में आने से हम बहुत ही खुश थे। अब हम दोनों का वक्त उसके साथ खेलने में कहां गुज़र जाता पता ही नहीं चलता था। संजना को तो जैसे कोई खिलौना मिल गया था,पूरा पूरा दिन उसीके साथ लगी रहती थी। मुझे कई बार तो ऐसा लगता जैसे रोहित के आने के बाद तो संजना ने मेरी तरफ ध्यान देना ही बंद कर दिया था। किसी चीज़ के न मिलने पर जब मैं उसे पूछता तो कह देती "वहीँ अलमारी में ही रखी होगी ज़रा ध्यान से देखलो" तो कभी सुबह ऑफिस जाने से पहले कह देती "आज टोस्ट ज़रा तुम खुद ही सेक लो मुझे रोहित तंग कर रहा है।" में उसे देखता रहता मगर अंदर से मै भी बहूत ही खुश था।

रोहित अब चलने लगा था,कई तरह की शरारतें भी करने लगा था। अब वह तुतला कर थोड़ा बहुत  बोलने की भी कोशिश करता था। वह मुझे पापा और संजना को मम्मा कह के बुलाता था। मुझे सुबह ऑफिस जाना होता यां काम से कहीं बहार जाना होता था तो मुझे तैयार होता देख वह मेरे पीछे पड़ जाता था।  बड़ी मुश्किल से संजना उसको बहला फुसला कर उसका ध्यान दूसरी तरफ करती थी, तब मै चुपके से बहार निकल पाता था।

समय इसी तरह पंख लगाये उड़ता रहा और आखिर वह दिन भी आ गया जिसका इंतज़ार हर माँ-बाप बडी ही शिद्दत से करते हैं।  आज रोहित की शादी थी।  हम दोनों की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था।  घर में एक और नया सदस्य आने वाला था।  हमारी बेटी नहीं थी इसलिए एक बेटी की कमी हमें हमेशा खलती रहती थी, आज वह कमी भी पूरी होने जा रही थी।

संजना को तो जैसे नया साथी मिल गया था, वह अपनी बहु का बहुत ही ध्यान रखती थी। उसे कभी कोई काम नहीं करने देती थी।  कई बार तो मै संजना को हलके से झिड़क कर कह देता कि "इस तरह तुम अपनी बहु की आदतें बिगाड़ रही हो",लेकिन संजना हंस कर मेरी बात को टाल जाती थी।

रोहित की शादी को करीब १८ महीने बीत गए थे।  सबकुछ ठीक चल रहा था। एकदिन मैं और संजना अपने घर की लॉन में बैठे सुबह का नाश्ता कर रहे थे,तभी रोहित हमारे पास आया और पास ही पड़ी कुर्सी को खिंच कर बैठ गया।
"लो बेटा तुम भी नाश्ता करो" संजना ने नाश्ते की प्लेट रोहित की तरफ बढ़ाते हुए कहा।
"नहीं माँ मुझे भूख नहीं है अभी, मैं बाद में कर लूँगा।" कुछ देर रुक कर वह फिर बोला "मम्मी-पापा मैं आपसे एक ज़रूरी बात करना चाहता हूं।" 
"हां बोलो बेटा" मैने उसकी तरफ देखते हुए कहा।  
"पापा" उसने झिझकते हुए कहा "दरअसल मैने अपना एक नया घर बुक करवाया था।  अब वह बन कर तैयार हो गया है" 
"अरे वाह यह तो बड़ी ही अच्छी बात है, तुमने पहले क्यों नहीं बताया ?" मैने रोहित की आँखों में आँखें डालते हुए पूछा 
"पापा मैं और तृषा (रोहित की पत्नी ) अब उस नए घर में शिफ्ट होना चाहते हैं।" 
मेरा निवाला मेरे हलक में जा कर अटक गया। मुझे लगा, किसीने गरम सीसा पिघला के मेरे कानों में डाल दिया हो।मैं सोचने लगा "तृषा और मैं", यानि ? मैं कुछ देर चुप रहने के बाद फिर बोला 
"क्या तुम हमसे अलग रहना चाहते हो?" मैंने संजना की तरफ देखते हुए रोहित से पूछा था। 
"पापा हम इसी शहर में ही होंगे, और फिर रविवार के रविवार  और बीच बीच में भी आपसे मिलने आते रहेंगे" रोहित ने हमें समझाते हुए कहा। 
"बेटा अब हम बूढ़े हो गए हैं ?" संजना की आँखे भरी हुईं थीं।"और फिर यहाँ और कोई तो है नहीं, क्या तुम अपने माँ पापा से अलग होना चाहते हो ?" 
"माँ हम आपसे दूर थोड़े ही जा रहे हैं आप भी हमारे घर आते जाते रहोगे" रोहित ने अपनी माँ को समझाते हुए कहा।  
"हमारे घर?" तो क्या रोहित इस घर को अपना घर नहीं समझ रहा था ?मुझे थोड़ा अजीब सा लगा। 
"बेटा कब जाना चाहते हो ?" मैं समझ चूका था फैंसला हो चूका है, ज़्यादा बहस करने का कोई फायदा नहीं था। 
"पापा कल ही" रोहित ने कहा तो संजना ने तुरंत कहा "बेटा कुछ दिन तो और हमारे साथ"…। 
"माँ" रोहित ने संजना को बीच ही में रोकते हुए कहा "बहूत काम हैँ, कल हमें शिफ्ट करना हे" कहता हुआ रोहित उठ कर चला गया। 

हम पर जैसे कोई पहाड़ टूट पड़ा था।  मेरा दिमाग सुन्न हो गया था और संजना की आँखों से आंसू बह रहे थे।  हमारा नाश्ता वहीँ का वहीँ पड़ा रह गया।  मै किसी तरह अपने लड़खड़ाते कदमो से अंदर कमरे में आ गया, संजना भी मेरे पीछे ही थी।  हम दोनों धप्प से सोफे पर बैठ गये। संजना की हालत मै समझ पा रहा था , उसकी आँखों से आंसू बह रहे थे और वह कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं थी।वह दिन हमारा इसी तरह गुज़र गया, हमने कुछ भी नहीं खाया था,रोहित व तृषा अपनी ही खुशियों को संजोने में लगे हुए थे, दोनों में से कोई भी हमें देखने भी नहीं आया था।

अगलेदिन सुबह ही से घर में एक अजीब सी चहल पहल थी। रोहित अपना सामान पैक करवा कर ट्रक में रखवा रहा था। मैं और संजना चुप थे, अंदर कमरे में से सब कुछ देख रहे थे। हम अपने आप को बहुत ही लाचार महसूस कर रहे थे। यहां कोई नहीं था जो हमारे दिल का दर्द समझ सके। तभी तृषा और रोहित अंदर कमरे में दाखिल हुए, रोहित ने मेरे पाँव छूते हुए कहा "अच्छा पापा चलते हैं" 
मुझे लगा जैसे किसीने मेरे शरीर का सारा खून निचोड़ लिया हो मैंने खड़े होकर दोनों को अपने गले लगा लिया, बहुत ही रोकने के बावजूद मेरी आँखों से आंसू बह निकले। संजना को जब दोनों मिले तो रोते हुए उसने कहा  "हमारे जाने तक अगर तुम लोग हमारे साथ रह लेते ?" और वह फूट फूट कर रोने लगी।  मैं और संजना रोहित को और तृषा को बाहिर गेट तक सी ऑफ करने गए तब मैने रोहित का हाथ अपने हाथ में कस कर दबा रखा था। अचानक रोहित ने अपना हाथ मेरे हाथ से छुड़ाते हुए कहा "ओके पापा बाई" मुझे उसके जन्म के वो क्षण याद आ गए जब उसने कस के मेरी ऊँगली को अपनी नन्ही मुट्ठी में दबा रखा था।  मुझे लगा आज उसने मेरी वह ऊँगली छोड़ दी थी। मेरी आँखों में आंसू थे, मुझे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था, पता नहीं कब वह गली का मोड़ मुड़ कर आगे निकल गए थे, मगर मैं काफी देर तक उन्हें हाथ हिला कर टाटा करता रहा था। 

उस रोज़ भी हमने कुछ नहीं खाया था, मगर हमें देखनेवाला कोई नहीं था, हमें पूछनेवाला कोई नहीं था आज। इसी तरह रात हो गयी। हम दोनों एक दुसरे से कोई बात नहीं कर रहे थे, रात को हम बिस्तर पर जा कर लेट गए, संजना ने मेरी तरफ पीठ की हुई थी मगर रात के सन्नाटे में उसकी सिसकियाँ साफ़ सुन रहा था।  हम दोनों ही रो रहे थे एक आँखों से अश्क बहा रहा था तो दूसरा दिल से रो रहा था।

अगले रोज़ भी सूरज वैसे ही निकला था, चिड़ियाँ वैसे ही चहक रहीं थीं, मगर मुझे सब कुछ बदला बदला सा नज़र आ रहा था, लगा सबकुछ वैसा ही होने के बावजूद भी हम किसी नयी दुनिया में आ गए थे, जहां हम बिलकुल अकेले थे, कोई हमारे साथ नहीं था। संजना चुप थी मैं चुप था। अगर कुछ बोलरहा था तो वह थी हमारे बीच बिसरी ख़ामोशी। मैं यह सोच कर ही सिहर जाता था कि अब हमें इन्ही खामोशियों के साथ रहना था। लगता था ज़िन्दगी जैसे ठहर सी गयी है।

शुरू शुरू में तो रोहित और तृषा हर छुट्टी पर आ जाया करते थे, मगर अब वह सिलसिला भी बंद जैसा ही था। हम लोग कभी बहुत उदास होते तो उनसे मिलने चले जाया करते थे। ज़िन्दगी इसी तरह गुज़र रही थी। अब संजना से भी ज़्यादा काम नहीं होता था,कभी कभी तो हम बगैर खाना खाए ही सो जाते थे।

आज सुबह से ही मन बहुत उदास था,शाम हो चली थी, मैं अपने बोझिल मन को हल्का करने के लिए बाहर लॉन में कुर्सी बिछा कर बैठा हुआ था, पास ही रेडियो पर गाना बज रहा था जिसके बोल  मेरे कानो में पड़ रहे थे -"जाते हुए ये पल छीन क्यों जीवन लिए जाते हैं" मैं उस गाने को बड़े ही ध्यान से सुन रहा था और सोचरहा था कि "सचमुच इंसान कितना बेबस हो जाता है हालात के आगे।" तभी मुझे अंदर से कुछ गिरने की आवाज़ आई तो मैं उठ कर तेज़ी से अंदर की तरफ दौड़ा। मैंने देखा संजना नीचे फर्श पर पड़ी हुई थी और उसकी साँसे तेज़ चल रहीं थीं। मैं घबरा गया, बुढ़ापे की वजह से शरीर दुर्बल हो गया था सो मैं उसे उठा नहीं पाया तो चिल्ला कर मैंने पड़ोस में आवाज़ दी, कुछ लोग भाग कर आये और संजना को उठा कर बिस्तर पर लिटाया। किसीने तुरंत रोहित को फ़ोन करदिया था।  मैं संजना के सिरहाने बैठा उसके सर पर हाथ फेर रहा था। 
"सुनो" संजना ने धीमे से कहा "अब अकेले नहीं रहा जाता इसलिए जा  रही हूँ"  
"और मेरा नहीं सोचा ?" मैंने  कहा "मैं एकदम अकेला कैसे रहूँगा ?"  मैंने  अपनी लडखडाती आवाज़ में कहा। 
"मुझे माफ़ करदेना मैं आपका साथ नहीं निभा पायी" संजना ने अपने कांपते हाथों से मेरा हाथ थामते हुए कहाथा।  तभी रोहित ने कमरे में कदम रखा।
उसे देखते ही संजना ने कहा "तू आगया बेटे,कितना इंतज़ार करवाया तूने ?" 
"मुझे माफ़ करदो माँ" रोहित ने अपनी माँ का हाथ अपने हाथों में लेकर कहा। 
"बस देखले बेटा, अब जा रही हूँ, सिर्फ  इतना ही समय तुझे हमारे साथ रहना था", कुछ रूककर वह फिर बोली "लेकिन मेरे जाने के बाद अपने पापा को अपने साथ ले जाना, मुझसे छुप छुप कर तुझे याद कर के बहुत ही रोते रहते हैं,।" 

संजना की साँसे बड़ी तेज़ चल रहीं थीं, ऐसा लगा जैसे संजना इस दुनिया से काफी ऊब चुकी थी, डॉक्टर के आने से पहले ही संजना चली गई।  
"पापा, आपने मुझे पहले क्यों नहीं कहा?" रोहित ने रोते हुए मुझसे कहा 
"बेटा यह तो संजना ने भी मुझसे नहीं कहा था" मैंने  उसकी तरफ देखते हुए कहा 

संजना  के जाने के बाद मैं अपने आप को बहुत ही अकेला महसूस करने लगा था। मैं अकेला बैठा यही सोचता रहता कि इंसान की ज़िन्दगी कहाँ से शुरू होती है और ज़िन्दगी के इस सफर में कितने मोड़ आते हैं और कितने उतार चढाव आते हैं, जिसकी  कल्पना भी इंसान ने नहीं की होती।

संजना को गए कुछ दिन हो गए थे,एकदिन रोहित ने मुझसे कहा "पापा अब आप हमारे साथ ही रहेंगे".
मैने उसकी आँखों में देखते हुए कहा "बेटा जो तुम्हारे साथ रहना चाहती थी वह तो चली गई। तुम्हे पता है रोज़ सुबह  उठते ही मुझसे कहती थी "देखना आज रोहित जरूर आएगा" और शाम होते वह दरवाज़े पर जाकर बैठ जाती थी, घंटो  दरवाज़े  पर बैठी तुम्हारा इंतज़ार करती रहती थी और जब तुम नहीं आते तो थके मन से अंदर आ जाती थी, मगर हर आहट पर दरवाज़े की तरफ देखती, कि कहीं तुम तो नहीं आये ? काफी  देर तक मुझसे बात नहीं करती थी। कई बार तुम्हारे पसंद की कोई चीज़ बना कर रखती कहती "रोहित को यह बहुत पसंद है वो जब आएगा तो मै उसे अपने हाथों से खिलाऊँगी", जब तुम नहीं आते तो अपनी बनाई हुई चीज़ फेंक देती और कहती "रोहित जब आएगा तो उसे ताज़ी बनाके खिाऊंगी।" तुम्हे पता है वह औरत तुम्हारे कारन कितनी रातें भूखी सोयी थी ? जब रात को तुम रोते थे तो पूरी रात तुम्हे अपने सीने से लगाकर घूमती रहती थी, तुम्हे पता है उस औरत की तुम्हारे कारन कितनी रातें रोते हुए गुज़री थीं? रोहित अगर तुमने थोड़ा समय और हमारे साथ गुज़ार लिया होता तो संजना की आखरी ज़िंदगी इतनी दर्द भरी नहीं होती।
"पापा मै बहुत शर्मिंदा हूँ, अब आप हमारे साथ ही रहेंगे, प्लीज पापा।" रोहित ने मेरे पाँव पकड़ कर गिड़गिड़ाते हुए कहा।

मैं हालाँकि जाना नहीं चाहता था मगर मैं यह भी जानता था कि मेरे लिए अब अकेला रहना मुश्किल है।

जिस दिन मै उस घर को छोड़ कर जा रहा था, मेरी आँखे नम थीं, मुझे याद आ रहे थे वह दिन जब मैंने और संजना ने एक साथ उस घर में प्रवेश किया था।


रोहित मेरा हाथ पकड़ कर धीरे धीरे चल रहा था। मैं अपनी ज़िंदगी के एक नए सफर पर चल पड़ा था, लेकिन मैं अपने हर कदम को आगे बढ़ाते हुए पीछे कुछ छोड़ता जा रहा था, आँखों में आंसू थे और मन ही मन सोच रहा था :  

"ज़िंदगी के सफर में गुज़र जाते हैं जो मका
  वो फिर नहीं आते, वो फिर नहीं आते"

Romy Kapoor (kapildev)

Tuesday, July 8, 2014

Kapildev Kohhli's Blogs: अमर रहे तेरा प्यार

Kapildev Kohhli's Blogs: अमर रहे तेरा प्यार: जब मै  उसे अपने घर लाया था, बहोत ही छोटा था वो, शायद एक महीने का रहा होगा।  छोटा सा बच्चा था। अभी तो वो ठीक से चल भी नहीं पाता था। वो जर्म...

अरमानों की अर्थी




जगजीत सिंघ जी की एक ग़ज़ल तो सभीने सुनी होगी 'ये दौलत भी लेलो ये शोहरत भी लेलो, भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी, मगर मुझको लौटादो बचपन मेरा, वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी ' कुछ ऐसी ही चाह हम सभी में छुपी हुई है।

मेरा भी बचपन का एक मित्र है। बचपन ही से हमारी दोस्ती काफी मशहूर थी, जब भी कोई हम में से किसी को अकेला देखता तो पूछ ही लेता  "क्या बात है आज तुम्हारा जोड़ीदार नहीं है तुम्हारे साथ ?" 
हम अक्सर अपने दिल की बातें एक दुसरे से शेयर किया करते थे। मेरा मित्र बहुत ही सेन्सिटिव व्यक्ति था। किसी के दुःख में वह दुखी और किसीकी ख़ुशी में वह ऐसे खुश होता था जैसे वह ख़ुशी और दुःख उसके अपने हों। बड़ा ही ज़िन्दा दिल इन्सान था वह । उसकी सोच काफी अलग थी। कई बार हममे कई बातों को लेकर बहस हो जाती थी, मगर हमेशा जीत उसी की होती थी।  अंत में वह मुझे मना ही लेता था।

एक दिन पास  ही में एक पति पत्नी को लड़ते झगड़ते देख वह किसी गहरी सोच में डूब गया, जब मैंने उसे झकझोड़ा तो जैसे नींद में से जागते हुए उसने कहा "यार, ये पति पत्नी आपस में इतना लड़ते झगड़ते क्यूँ हैं ? क्या किसीको भी यह पता है की कौन कितना जीएगा ? जितनी भी ज़िन्दगी है वह हंस खेल कर क्यों नहीं गुज़ारी जा सकती ? ताकि भगवन न करे अगर दोनों में से एक भी अगर अचानक चला जाता है तो कुछ मधुर यादें तो होंगी  जो उस ज़िंदा व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कुराहट ला सकती हैं।  वह मधुर यादें शायद उसके ज़िंदा रहने के लिए काफी होंगी। " मैंने उसकी आँखों में देखा, उसने आगे बोलते हुए कहा "देखना मैं अपनी पत्नी को कितना खुश रखूँगा, बहुत प्यार दूंगा उसे , हमेश पलकों पर बिठा के रखूँगा।"

मै आज भी जब अकेला बैठा होता हूँ तो उसकी वह बातें मुझे याद आती हैं, उसीके बारे में मैं सोचता रहता था।मैंने अक्सर लोगों को यह कहते सुना है कि ' एक लड़की कितना बड़ा बलिदान देती है ! वह अपना घर, परिवार छोड़ कर एक अजनबी घर को अपना घर बना लेती है।' मगर जब भी मैं अपने मित्र को  देखता हूँ तो सोचता हूँ कि क्यूँ सिर्फ एक लड़की ? क्या एक लड़का एक अनजान लड़की, जिसे वह कभी मिला ही नहीं ,जिसे वह अच्छी तरह से जानता भी नहीं, को अपने पूरे घर की ज़िम्मेदारी सौप कर एक  बड़ा रिस्क नहीं लेता ?  उसके माता पिता के अरमान, भाई बहनो का स्नेह, सभी कुछ तो सौप देता है।  लेकिन अगर लड़की सही निकली तो ठीक अगर वह गलत निकली तो ? कहते हैं एक अच्छी औरत घर को स्वर्ग बना देती है मगर एक बुरी औरत घर को नर्क भी तो बना देती है।

कुछ ऐसा ही मेरे मित्र के साथ भी हुआ।  शादी के बाद मैंने उसकी ज़िन्दगी को रेल गाड़ी की तरह पटरी से उतर कर बिखरते हुए देखा था।  जहाँ तक मुझे याद है उसकी शादी के कुछ ही समय बाद उसकी ज़िंदगी में बवंडर उठने लगे थे। कितना खुश था वह अपनी शादी पर ! शादी के बाद कुछ समय बाद तक तो वह जब भी मुझसे मिलता, उसके चेहरे पर एक अजीब सी ख़ुशी और चमक नज़र आती थी। मगर वह ख़ुशी बहुत ही जल्द गायब होने लगी थी। मै उसमे आये इस बदलाव को भली भांति भांप रहा था।  मैंने एक दिन उससे पूछा "यार क्या बात  है तुम आजकल काफी बुझे बुझे से रहते हो ?" तब उसने बड़ी ही मायूसी के साथ कहा था "क्या बताऊँ ? शादी के बाद कुछ समय तो ठीक गुज़रा, मगर अब सारे सपने चूर चूर होते नज़र आ  रहे हैं। रूपा (उसकी पत्नी) हर रोज़ मेरे माँ और बाबा से लड़ती झगड़ती  रहती है, न ही उसकी  मेरे बहन भाइयों से बनती है। मै जब भी ऑफिस से घर लौटता हूँ तो एक नया झगड़ा और एक नयी उलझन।  मैने रूपा को काफी समझाने की कोशिश की मगर अब तो वह मुझसे भी लड़ती झगड़ती रहती है।  कई बार तो रात रात भर वह लड़ती रहती है। मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि मै क्या करू ? इन रोज़ रोज़ के झगड़ों से मैं परेशान हो  गया हूँ।"

अबतो उसके चहरे पर कभी कभी दिखने वाली हंसी भी गायब हो गयी थी। उसने हर प्रकार से अपनी पत्नी को समझाने की कोशिश की थी। कभी प्यार से तो कभी डांट कर उसदिन तो उसने अपनी पत्नी को थप्पड़ भी मार दिया था। "यार मैंने कभी सोचा नहीं था कि मै कभी अपनी ज़िन्दगी में अपनी पत्नी पर हाथ भी उठाऊंगा" ?उसने बड़े ही दुखी मन से कहा था।  मुझे याद आ रहे थे वह शब्द जो उसने एक दम्पति को लड़ता देख कर कहे थे "यार ये पति पत्नी आपस में इतना लड़ते झगड़ते क्यूँ हैं ?......" सचमुच इन्सान कई बार कितना लाचार हो जाता है ! वह सोचता कुछ है और होता कुछ, तभी तो कहते हैं 'कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता, कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता"

"यार ज़िन्दगी अब तो बोझ सी लगने लगी है। रूपा किसी भी बात को समझने को तैयार ही नहीं, उसके घर वालों से कहता हूँ तो वह मुझे ही दोषी ठहरा कर मुझसे ही लड़ना शुरू कर देते हैँ। थके पावों पर अपनी ज़िन्दगी का बोझ उठाते उठाते अब थकान सी महसूस होने लगी है। ज़िन्दगी बालू के घर की तरह ढह गयी है... मैंने ज़िन्दगी से ऐसा तो कुछ नहीं माँगा था। फिर क्यों.....?" उसकी आँखों का दर्द मैं ठीक से देख पा रहा था।
मैंने भी उसकी पत्नी को समझाने की काफी कोशिश की थी ,मगर मुझे लगा था कि उसमे इतनी समझ ही नहीं थी कि वह कुछ बातों को समझ सके। क्या कोई औरत इतनी भी बेवकूफ हो सकती है कि वह अपने ही घर को नरक बना कर उसमे बड़े ही आराम से रहे ?

यहाँ गलती उसके मायके वालों की भी थी। शादी के बाद ज़रूरत से ज़्यादा अपनी लड़की के घरेलु मामलों में दखल अंदाज़ी करना और शादी के बाद अपनी लड़की को ज़रुरत से ज़्यादा प्रोटेक्ट करना, घरों को बर्बाद कर के रख देता है। शादी के बाद लड़की का अपने मायके में ससुराल की सारी बातें बताना और हर बात में अपने मायके की सलाह पर चलना वैवाहिक जीवन के लिए काफ़ी घातक साबित हो सकता हे।

ऐसा नहीं था  कि रूपा के माता पिता और बहन भाई उसके स्वाभाव के बारे में जानते नहीं थे, ऐसे में जब उसके मायके में झगड़ों की बात पहुंची तभी उसे सपोर्ट करने की बजाय अगर उन्होंने सख्ती से उसे समझाया होता तो शायद मेरे मित्र की ज़िन्दगी में इतना तूफ़ान नहीं आया होता।  मैने लोगों को यह कहते सुना है कि बहु को बेटी का दर्ज़ा देना चाहिए तो क्या यह बात दामाद के लिए लागु नहीं होती ? काया दामाद को भी एक बेटा समझ कर उसकी बातों को भी नहीं सुना जाना चाहिए ?

जहाँ तक मै अपने दोस्त को जनता हूँ, अगर उसकी पत्नी घर में सबसे प्यार से रहती और अपने पति को भी ठीक से समझती तो वह उस घर में बहुत  सी खुशियां पाती और वो घर जो आज नर्क बना हुआ था, एक स्वर्ग बन जाता।

अब मेरा दोस्त मुझे कभी कभी ही दिखाई देता है और जब कभी मिल भी जाता है, मुझे लगता है वह कितना थक चूका है, अंदर से टूट चूका है। ऐसा लगता था जैसे वह अपने अरमानों की अर्थी को अपने ही कन्धों पर ढो रहा है।  उसकी आँखों में एक गहरी उदासी थी मगर कईं सवाल भी छुपे हुए थे... शायद ऊपर वाले से पूछ रहा था कि "क्या गुनाह था उसका जो उसे ऐसी ज़िन्दगी मिली थी ?" वह चुप था मगर उसकी इस चुप्पी में भी मैं उसके दिल की आवाज़ को साफ़ सुन पा रहा था।  शायद वह कह रहा था

"जीने के लिए सोचा ही न था दर्द सँभालने होंगे 

मुस्कुराये तो मुस्कुराने के क़र्ज़ उतारने होंगे " 


Romi Kapoor (Kapildev)